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संपादकीय: आतंक का पोषण

पाकिस्तान उन्हीं देशों में से एक है, जिसके बारे में विश्व समुदाय की यह धारणा बनी है कि वह आतंकवादी संगठनों को अलग-अलग स्रोतों से मिल रही वित्तीय मदद या उनकी गतिविधियों को रोक पाने में अपेक्षा के अनुरूप कामयाब नहीं हुआ है।

Pakistan, FATF, Chinaपाकिस्तान पर FATF के प्रतिबंधों के बीच प्रधानमंत्री इमरान खान देश की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने में नाकाम रहे हैं।

आतंकवाद से जूझती दुनिया को राहत दिलाने या इसकी त्रासदी को खत्म करने के लिए सबसे जरूरी है कि इसके वित्तीय स्रोतों को रोका जाए। पिछले करीब दो दशक के बीच की घटनाओं के मद्देनजर वैश्विक स्तर पर इसके लिए जिम्मेदार कारकों और वैसे पक्षों की पहचान की जा सकी है, जो परोक्ष रूप से आतंकी संगठनों को या तो वित्तीय मदद मुहैया कराते हैं या फिर इसे रोक पाने में नाकाम हुए हैं।

पाकिस्तान उन्हीं देशों में से एक है, जिसके बारे में विश्व समुदाय की यह धारणा बनी है कि वह आतंकवादी संगठनों को अलग-अलग स्रोतों से मिल रही वित्तीय मदद या उनकी गतिविधियों को रोक पाने में अपेक्षा के अनुरूप कामयाब नहीं हुआ है। दरअसल, आतंकी संगठनों के खिलाफ कार्रवाई किसी भी सरकार की राजनीतिक इच्छाशक्ति पर निर्भर करती है और इस लिहाज से देखें तो पाकिस्तान ने ऐसे कदम नहीं उठाए हैं, जिसे आतंकवाद पर लगाम लगाने के मद्देनजर ठोस पहलकदमी कहा जाए।यह बेवजह नहीं है कि वैश्विक आतंकवाद पर नजर रखने वाले एक अंतरराष्ट्रीय मंच फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स यानी एफएटीएफ की ताजा बैठक में एक बार फिर से पाकिस्तान को ग्रे सूची में ही बनाए रखने का फैसला लिया गया।

गौरतलब है कि एफएटीएफ ने अपने आकलन में उन सत्ताईस कार्ययोजनाओं में से छह को पूरा करने के मामले में पाकिस्तान को नाकाम पाया, जबकि इसे पूरा करने की समय-सीमा खत्म हो गई है। अब एफएटीएफ ने अगले साल यानी 2021 तक पाकिस्तान को सभी कार्ययोजनाओं को पूरा करने को कहा है। विडंबना यह है कि आतंकवाद का वित्तपोषण करने को लेकर लंबे समय से कठघरे में होने और सवाल उठाए जाने के बावजूद पाकिस्तान ने इस मसले पर ऐसे कदम नहीं उठाए, जिससे विश्व समुदाय के बीच उसे लेकर कोई सकारात्मक धारणा बन सके।

आखिर क्या वजह है कि एफएटीएफ की बैठक में भी पाकिस्तान को तुर्की को छोड़ कर चीन, मलेशिया और सऊदी अरब जैसे देशों का भी समर्थन नहीं मिल सका, जिनके भरोसे वह ग्रे सूची से बाहर आने की उम्मीद कर रहा था? साफ है कि उसके कुछ मित्र देशों को भी इस पर भरोसा नहीं है कि पाकिस्तान आतंकवादी संगठनों के वित्तपोषण पर रोक लगाने के लिए कुछ कर रहा है। इसके अलावा, अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी भी पाकिस्तान स्थित ठिकानों से अपनी गतिविधियां चला रहे आतंकी संगठनों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने की उसकी प्रतिबद्धता से संतुष्ट नहीं हैं।

विचित्र है कि पाकिस्तान एफएटीएफ की ओर से लागू प्रतिबंधों का नुकसान समझता है, इसके दायरे से बाहर भी आना चाहता है, लेकिन इसके लिए निर्धारित शर्तों को पूरा करना वह जरूरी नहीं मानता है। जबकि एफएटीएफ का मुख्य उद्देश्य ही विश्व स्तर पर मनी लॉन्ड्रिंग से निपटने और आतंकवादी संगठनों को वित्तीय मदद मुहैया कराने से रोकने के लिए नीतियां बनाना है। ऐसे में समझा जा सकता है कि एफएटीए के रूप में एक महत्त्वपूर्ण वैश्विक मंच ने पाकिस्तान को क्यों ग्रे सूची में बनाए रखा है। फिलहाल उसके लिए राहत की बात सिर्फ यह है कि उसे काली सूची में नहीं डाला गया।

मौजूदा समय में ग्रे सूची में होने का ही खमियाजा पाकिस्तान कई तरह के आर्थिक सीमाओं और प्रतिबंधों को झेलने के रूप में चुका रहा है। काली सूची में डाल दिए जाने के बाद अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व बैंक जैसी दूसरी संस्थाओं से उसे कर्ज मिलना तक बंद हो जा सकता है। यह समझना मुश्किल है कि इस खतरे के बावजूद पाकिस्तान आतंकवादी संगठनों के खिलाफ दिखावे के कुछ कदम उठाने के बजाय ऐसी कार्रवाई करने से क्यों हिचक रहा है, जो वास्तव में आतंकवाद को पनाह और उसके वित्तपोषण पर रोक लगाए!

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