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संपादकीयः हादसों के पुल

मुंबई-गोवा राजमार्ग पर रायगढ़ के महाड़ इलाके में सावित्री नदी पर बने एक पुल के ढह जाने, उसमें कई लोगों की मौत और तीन दर्जन से ज्यादा लोगों के लापता होने की घटना ने फिर साबित किया है...

Author Updated: August 4, 2016 1:49 AM

मुंबई-गोवा राजमार्ग पर रायगढ़ के महाड़ इलाके में सावित्री नदी पर बने एक पुल के ढह जाने, उसमें कई लोगों की मौत और तीन दर्जन से ज्यादा लोगों के लापता होने की घटना ने फिर साबित किया है कि सरकार और संबंधित महकमे अपनी ड्यूटी को लेकर किस हद तक लापरवाह हैं। गौरतलब है कि यह पुल ब्रिटिश शासन में ही बनाया गया था। आजादी के बाद जरूरत के मद्देनजर और पुराने पुल की क्षमता को देखते हुए उसके समांतर एक अन्य पुल बनाया गया। लेकिन जहां किसी नए पुल की भी नियमित निगरानी संबंधित महकमे के अधिकारियों की जिम्मेदारी होनी चाहिए, वहां भारी बारिश की वजह से सावित्री नदी में आई बाढ़ और उफनती तेज धारा के बावजूद पुराने पुल पर भी आवाजाही रोकने की कोशिश नहीं की गई। मंगलवार की रात को वह पुल नदी का तेज बहाव नहीं झेल सका और उसका काफी बड़ा हिस्सा भरभरा कर ढह गया।

इसकी चपेट में सवारियों से भरी दो बसें और कई अन्य वाहन भी आए और नदी में गिर कर उसकी तेज धारा में लापता हो गए। हादसे के बाद महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने ट्विटर पर कहा कि राजमार्ग पर यातायात रोक दिया गया है; प्रशासन नए पुल की मजबूती और क्षमता का आकलन कर रहा है। यह विचित्र है कि जब वहां एक पुल के ढह जाने से कई लोगों के मारे जाने या लापता होने की घटना हो गई, तब नए पुल के दुरुस्त होने की जांच की जा रही है। सवाल है कि अंगरेजों के काल में बने उस पुल को जानलेवा जोखिम की हालत में क्यों छोड़ा गया था? क्या इस हादसे का इंतजार किया जा रहा था? समय रहते इस पुराने पुल की भी नियमित जांच की गई होती और उस पर यातायात को रोका गया होता तो क्या इतने बड़े हादसे से बचा नहीं जा सकता था?

देश भर में ऐसे सैकड़ों पुल-पुलिया और फ्लाइओवर हैं जो जर्जर हालत में किसी बड़ी दुर्घटना को न्योता देते दिखते हैं। कई बार ऐसा भी देखा गया है कि किसी पुल के कमजोर या जर्जर होने की शिकायत के बाद मामूली मरम्मत करके उसे पहले की तरह मजबूत मान कर खुला छोड़ दिया जाता है। सरकार और प्रशासन की नींद तब खुलती है जब पुल ढहने और उसमें लोगों के मारे जाने की कोई बड़ी घटना सामने आ जाती है। ऐसे हरेक हादसे के बाद जांच और हताहत लोगों का पता लगा कर उन्हें मुआवजा देने की घोषणा की जाती है। लेकिन न तो पुलों के निर्माण से लेकर उन्हें जर्जर हालत में छोड़ देने वाले दोषियों की पहचान कर उनके खिलाफ कोई कार्रवाई की जाती है, न रखरखाव और पुलों पर निगरानी रखने से संबंधित महकमे को हमेशा सक्रिय रखने की जरूरत समझी जाती है।

खुद सरकार की ओर से गठित समितियों की रिपोर्टों के मुताबिक देश में काफी बड़ी तादाद में छोटे-बड़े पुल जर्जर हो चुके हैं, जिनमें कई ब्रिटिश शासन के दौरान बनाए गए थे और उनका उपयोग बंद हो जाना चाहिए था। महाराष्ट्र के अलावा पश्चिम बंगाल, बिहार, ओड़िशा, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश, केरल, तमिलनाडु और पूर्वोत्तर के राज्यों में सड़कों और नदियों-नहरों पर बने कितने ही पुलों की हालत खराब है। खासतौर पर बरसात के दिनों में ये जानलेवा हादसों का इंतजार कर रहे होते हैं। लेकिन ऐसे तमाम खतरनाक पुलों को भी भारी वाहनों और लोगों से भरी गाड़ियों की आवाजाही के लिए खुला छोड़े रखा जाता है। निर्बाध फोरलेन सड़कों पर अरबों रुपए खर्च करने वाली सरकारों के लिए आखिर किन वजहों से पुलों को भी पूरी तरह सुरक्षित बनाना जरूरी नहीं लगता!

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