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लाचारी और लापरवाही

पिछले साल अक्तूबर में सुप्रीम कोर्ट ने आम्रपाली बिल्डर के खिलाफ सख्त कदम उठाते हुए समूह की संपत्तियां सील कर दी थीं। कंपनी के सारे दस्तावेज जांच अधिकारियों के हवाले करवा दिए थे और तीन निदेशकों को गिरफ्तार करवाया था।

दोनों प्राधिकरणों का यह कदम उन बयालीस हजार लोगों के लिए बड़ा झटका है जिन्होंने आम्रपाली की परियोजनाओं में घर खरीदने के लिए पैसे लगाए थे।

आम्रपाली समूह की अधूरी परियोजनाओं को पूरा कराने के मामले में नोएडा और ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण ने हाथ खड़े कर दिए हैं। दोनों प्राधिकरणों ने सर्वोच्च न्यायालय में साफ कह दिया है कि वे इस काम को पूरा करवा पाने में सक्षम नहीं है। दोनों प्राधिकरणों का यह कदम उन बयालीस हजार लोगों के लिए बड़ा झटका है जिन्होंने आम्रपाली की परियोजनाओं में घर खरीदने के लिए पैसे लगाए थे। सर्वोच्च अदालत में दोनों प्राधिकरणों ने जिस तरह से अपनी लाचारी जाहिर की है, वह हैरान करने वाली है। ये दोनों प्राधिकरण उत्तर प्रदेश सरकार के निकाय हैं और इनका महत्त्व इसलिए भी ज्यादा है कि दिल्ली के पास दो बड़े नगर इन प्राधिकरणों के ही बसाए हुए हैं। आम्रपाली की परियोजनाएं भी इन्हीं की जमीन पर हैं और उस पर सारे कायदे-कानून भी इन्हीं के लागू होते हैं। ऐसे में सवाल तो यही उठता है कि अगर नोएडा और ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण भी हाथ झाड़ लेंगे तो बिल्डरों से धोखा खाए हुए निवेशकजाएंगे कहां?

सुप्रीम कोर्ट ने आठ मई को आम्रपाली समूह की सभी पंद्रह आवासीय संपत्तियां दोनों प्राधिकरणों को सौंपने की बात कही थी। जाहिर है, अदालत को कुछ तो उम्मीद रही होगी सरकार के इन निकायों से। लेकिन दोनों प्राधिकरणों ने अदालत में जो रुख दिखाया है और जिस तरह के तर्क रखे, वे इनकी लापरवाही, अक्षमता और पंगुता के परिचायक हैं। इन प्राधिकरणों ने अदालत को बताया कि वे बयालीस हजार अधूरे फ्लैटों का काम इसलिए पूरा नहीं करवा सकते क्योंकि इसके लिए उनके पास न तो संसाधन हैं और न ही जरूरी विशेषज्ञता। ज्यादा गंभीर बात तो यह है कि सब कुछ जानते-समझते समय रहते इन प्राधिकरणों ने आम्रपाली समूह के खिलाफ कोई कदम नहीं उठाया। इसकी वजह समूह का राजनीतिक रसूख बताई गई। जबकि दोनों प्राधिकरणों को समूह से पांच हजार करोड़ रुपए वसूलने हैं। प्राधिकरणों की ऐसी लाचारी चिंताजनक है। निजी बिल्डर इन्हीं सरकारी कमजोरियों का फायदा उठाते हैं और लोगों को ठगते हैं। यह हमारे भ्रष्ट तंत्र का एक उदाहरण है।

पिछले साल अक्तूबर में सुप्रीम कोर्ट ने आम्रपाली बिल्डर के खिलाफ सख्त कदम उठाते हुए समूह की संपत्तियां सील कर दी थीं। कंपनी के सारे दस्तावेज जांच अधिकारियों के हवाले करवा दिए थे और तीन निदेशकों को गिरफ्तार करवाया था। यह समूह लंबे समय से अपने राजनीतिक रसूख के बल पर जिस तरह से अदालती आदेशों की अवहेलना करता रहा, उससे तो लग रहा था कि बड़े बिल्डरों में कानून को लेकर भय नहीं है। अगर फ्लैट खरीदारों ने अदालत का दरवाजा नहीं खटखटाया होता और उनके हित में सुप्रीम कोर्ट ने कड़े कदम नहीं उठाए होते तो ऐसे बिल्डर कब के भाग निकले होते। पिछले दो दशक में दिल्ली और इसके आसपास के इलाकों में बड़े बिल्डरों ने तेजी से अपना कारोबार फैलाया और लोगों को सस्ते फ्लैटों का सपना दिखाया। ज्यादातर बड़ी बिल्डर कंपनियों ने जमीन खरीदने से लेकर उस पर निर्माण तक में किसी नियम-कानून का पालन नहीं किया, न ही ग्राहकों को कभी कोई सही जानकारी दी। इस तरह सब जगह लोगों से पैसा तो लिया जाता रहा, लेकिन कहीं भी परियोजना पूरी नहीं की गई। नतीजा यह हुआ ग्राहक फंस गए और लंबे इंतजार के बाद भी फ्लैट नहीं मिले। सवाल यह है कि आम्रपाली के बयालीस हजार निवेशकों को मकान कैसे मिलेंगे? जिस तरह से इन दोनों प्राधिकरणों के संरक्षण में आम्रपाली व दूसरे बिल्डर समूह जनता का पैसा डकार गए, उसके लिए क्या इन दोनों निकायों को भी न्याय के कठघरे में नहीं लाया जाना चाहिए?

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