देश का संविधान हर नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार देता है। इसके तहत कोई भी व्यक्ति शांतिपूर्ण तरीके से मौखिक, लिखित, कलात्मक और डिजिटल माध्यमों से अपने विचार व्यक्त कर सकता है। यह लोकतांत्रिक व्यवस्था की नींव है और किसी भी देश के चहुंमुखी विकास के लिए यह अत्यंत आवश्यक है।
मगर सवाल है कि क्या सरकार की नीतियों या फैसलों का विरोध करना अपराध की श्रेणी में आता है? इस पर अदालतों की ओर से समय-समय पर स्थिति स्पष्ट की जाती रही है और इसी क्रम में अब बॉम्बे हाई कोर्ट ने अपने एक महत्त्वपूर्ण फैसले में कहा है कि देश के नागरिकों को सरकार का गुलाम नहीं बनाया जा सकता। किसी व्यक्ति को सिर्फ इसलिए जिलाबदर करने का आदेश नहीं दिया जा सकता कि वह सरकार के खिलाफ आंदोलनों और विरोध प्रदर्शनों में शामिल है। ऐसा करना निश्चित रूप से उसके मौलिक अधिकारों, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सम्मान के साथ जीवन जीने के अधिकार को प्रभावित करता है।
सहमति और असहमति दो ऐसे पहलू हैं, जिनकी लोकतंत्र को मजबूती देने में अहम भूमिका है। संवैधानिक अधिकारों के लिहाज से देखा जाए, तो अगर कोई व्यक्ति शासन-प्रशासन की नीतियों, व्यवस्था या किसी विचारधारा का विरोध करता है, तो उसे स्वस्थ आलोचना के तौर पर देखा जाना चाहिए।
मगर देश में ऐसे मामले अक्सर सामने आते रहते हैं, जब इस तरह की आलोचना को साजिश या बगावत बता दिया जाता है। ऐसे में यह सवाल महत्त्वपूर्ण है कि अगर हर आलोचना या असहमति को अपराध की श्रेणी में रखा जाएगा, तो लोकतंत्र का मूल तत्त्व कैसे जीवित रह पाएगा?
बॉम्बे हाई कोर्ट ने भी अपने फैसले में यह सवाल उठाया है कि आम नागरिक सरकार की किसी कार्रवाई या फैसले के खिलाफ शांतिपूर्ण तरीके से विरोध प्रदर्शन क्यों नहीं कर सकते? क्या यह नागरिकों को सरकार का गुलाम बनाने जैसा नहीं है? इसमें दोराय नहीं कि अगर अन्याय के खिलाफ और सुधार की मांग के पक्ष में उठने वाली हर आवाज को दबाने की कोशिश की जाए, तो यह लोकतांत्रिक मूल्यों पर आघात नहीं, तो और क्या होगा।
अमेरिका स्थित स्वतंत्र प्रबुद्ध संस्था ‘द फ्यूचर ऑफ फ्री स्पीच’ के एक नए वैश्विक सर्वेक्षण के मुताबिक, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मामले में दुनिया के प्रमुख 33 देशों में भारत 24वें स्थान पर है। रिपोर्ट के मुताबिक, हालांकि अभिव्यक्ति की आजादी के लिए सैद्धांतिक समर्थन मजबूत बना हुआ है, लेकिन इस अधिकार की रक्षा करने की प्रतिबद्धता दुनिया के कई हिस्सों में कमजोर हो रही है, जिनमें भारत भी शामिल है।
यह छिपा नहीं है कि हाल के वर्षों में देश के भीतर शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों को भी साजिश बताया जाने लगा है। फिर चाहे विद्यार्थियों का परीक्षाओं की शुचिता को लेकर आवाज उठाना हो या फिर अपनी मांगों को लेकर कर्मचारियों का सड़क पर उतरना। विपक्षी दलों की ओर से भी यह आरोप लगाया जाता रहा है कि सरकार की नीतियों का विरोध करने पर उनके खिलाफ प्रतिशोध की भावना से कार्रवाई की जाती है।
अगर कोई व्यक्ति सरकार के निर्णय का विरोध करता है, तो उसके खिलाफ मामला दर्ज करना कितना उचित है, इस पर विचार किया जाना चाहिए। यह याद रखना अत्यंत आवश्यक है कि अगर लोकतंत्र को सही मायने में जिंदा रखना है, तो नागरिकों के तमाम अधिकारों की रक्षा करना सरकार का प्राथमिक कर्तव्य होना चाहिए।
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बॉम्बे हाई कोर्ट ने गुरुवार को एक मामले की सुनवाई के दौरान सरकार के पक्ष लेने पर पुलिस को कड़ी फटकार लगाई है। कोर्ट ने कहा कि किसी नागरिक की ओर से केंद्र सरकार के कुछ फैसलों का विरोध करने और उसके खिलाफ नारे लगाने मात्र से उसे किसी भी क्षेत्र से निष्कासित नहीं किया जा सकता। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक
