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संपादकीयः खूनी होली

प्रेम और सौहार्द के रंगों में लहू का रंग घुल जाने से इस बार होली कुछ ज्यादा ही बदरंग हो गई है। उत्तर प्रदेश में जहां होली ने इस साल तैंतालीस लोगों की जान ले ली वहीं दिल्ली के एक डॉक्टर को हुड़दंगियों ने नृशंसता से पीट कर मौत के घाट उतार दिया।

Author March 26, 2016 3:28 AM
(file Photo)

प्रेम और सौहार्द के रंगों में लहू का रंग घुल जाने से इस बार होली कुछ ज्यादा ही बदरंग हो गई है। उत्तर प्रदेश में जहां होली ने इस साल तैंतालीस लोगों की जान ले ली वहीं दिल्ली के एक डॉक्टर को हुड़दंगियों ने नृशंसता से पीट कर मौत के घाट उतार दिया। देश के अन्य हिस्सों से भी होली पर खूनखराबे की खबरें आई हैं जो बताती हैं कि किस तरह रंगों के इस त्योहार को कुछ लोगों ने रंजिश निकालने के अवसर में तब्दील कर दिया है। छोटी होली के दिन दिल्ली में मारे गए डॉक्टर का कसूर बस इतना था कि वे अपने बेटे के साथ गली में क्रिकेट खेल रहे थे। इस दौरान गेंद पास से गुजर रहे स्कूटी सवार को जा लगी, जिस पर दोनों में विवाद हुआ।

इसके कुछ ही देर बाद स्कूटी सवार ने अपने दर्जन भर साथियों के साथ डॉक्टर के घर धावा बोल दिया और उसे लाठी-डंडों पीट-पीट कर मार डाला। इस मामले में हालांकि पुलिस ने चार नाबालिगों सहित आठ लोगों को गिरफ्तार किया है लेकिन एक मामूली विवाद का यह जानलेवा अंजाम दिल दहलाने वाला है। क्या शहरी जीवन के तनावों ने लोगों की संवेदनाओं को इतना कुंद कर दिया है कि उमंग, उल्लास, उदारता के त्योहारी माहौल में भी अपनी आपराधिक मानसिकता को जघन्य परिणति तक ले जाने में जरा भी नहीं झिझकते! चारों तरफ रंगोत्सव की धूम और उसके बीच मारे गए लोगों के घरों में पसरा मातम, आखिर होली के रंगों को लहू के रंग से मुक्ति हम कब दिलाएंगे?

इस साल होली के दिन भीषण हादसों ने भी उमंग-उल्लास के माहौल में मातम का रंग भरने में कोई कसर नहीं छोड़ी। आपसी रंजिश, शराबखोरी, गोलीबारी, छुरेबाजी और झगड़े-फसाद में तो दर्जनों लोग लोग मारे ही गए, अकेले उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले में होली मेले से लौट रहे वाहन को एक ट्रक ने रौंद डाला, जिससे नौ लोगों की मौके पर ही मौत हो गई। अन्य जानलेवा सड़क हादसों की वजह नशे की हालत में गाड़ी चलाना थी। अफसोस की बात है कि होली पर खूब शराब पीने का चलन देश में बढ़ता ही जा रहा है। इस त्योहार पर शराब पीने को सामाजिक स्वीकृति-सी हासिल हो गई है। शराब के नशे मेंं मामूली बात पर गोलीबारी, चाकूबाजी, बदला लेने, रंजिशन हत्या कर डालने के मामले बढ़ते जा रहे हैं।

नशा न केवल उचित निर्णय लेने की इंसानी क्षमता पर विपरीत असर डालता है बल्कि मनुष्य का विवेक भी हर लेता है जिसकी परिणति अक्सर होली के रंग में खून का रंग मिल जाने में होती है। होली के दिन हालांकि शराब की बिक्री पर पाबंदी अर्थात ‘ड्राई डे’ होता है लेकिन कौन नहीं जानता कि लोग पहले ही पर्याप्त मात्रा में शराब खरीद कर रख लेते हैं जो त्योहार पर उनकी रगों में नशा और सड़कोें पर खून बन कर बहती है। रंजिश, नफरत, द्वेष-दुश्मनी आदि निश्चित ही इंसानी मानस के स्थायी दुर्भाव हैं जिनसे समाज के पूरी तरह मुक्त होने की कल्पना करना दिवास्वप्न ही है। लेकिन होली जैसे पावन त्योहार को इन भावों का बंधक बना कर खून में क्यों रंगा जाना चाहिए? हमारे सभी त्योहार तो इन दुर्भावों पर प्रेम, मानवीयता, संवेदना और बंधुत्व जैसे सद््भावों की विजय का उत्सव रहे हैं। हमें इन्हें खूनी होने से हर हाल में बचाना चाहिए।

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