रक्तदान को महादान कहा जाता है, क्योंकि इससे लोगों को नया जीवन मिलता है। देश में रक्त की जरूरत के मुकाबले आपूर्ति आज भी काफी कम है। ऐसे में सरकार और सामाजिक संगठनों की ओर से रक्तदान के महत्त्व को समझाने तथा इसे प्रोत्साहित करने के लिए जागरूकता अभियान भी चलाए जाते हैं। इसके अलावा, देश भर में जगह-जगह शिविर भी लगाए जाते हैं, ताकि लोग आसानी से स्वैच्छिक रक्तदान कर सकें।

मगर सवाल है कि दान के माध्यम से जो रक्त एकत्र किया जाता है, वह दूसरे लोगों के लिए कितना सुरक्षित है? यह मसला चिंताजनक और संवेदनशील है, क्योंकि मरीजों को संक्रमित रक्त चढ़ाने और उससे कई तरह की जटिलताएं पैदा होने या जान जाने के मामले अक्सर सामने आते रहते हैं। इसी के मद्देनजर सुप्रीम कोर्ट ने बीते बुधवार को देश भर के सरकारी अस्पतालों में मरीजों को रक्त चढ़ाने से होने वाले विभिन्न तरह के संक्रमण का पता लगाने के लिए न्यूक्लिक एसिड एंप्लीफिकेशन परीक्षण (एनएटी) की सुविधा के खर्च और उपलब्धता की जानकारी मांगी है।

दरअसल, शीर्ष अदालत में दायर एक जनहित याचिका में मांग की गई है कि देश के सभी रक्त बैंकों में ट्रांसफ्यूजन ट्रांसमिसिबल इन्फेक्शन (टीटीआइ) का पता लगाने के लिए एनएटी को अनिवार्य किया जाना चाहिए। गौरतलब है कि इस परीक्षण के तहत रक्त में एचआइवी, हेपेटाइटिस बी, हेपेटाइटिस सी, मलेरिया और सिफलिस जैसी बीमारियों के संक्रमण की जांच की जाती है।

इसमें दोराय नहीं कि रक्तदान के दौरान अनिवार्य रूप से संक्रमण की जांच के नियम लागू हैं, इसके बावजूद अगर मरीजों को संक्रमित रक्त चढ़ा देने के मामले सामने आ रहे हैं, तो इससे स्वास्थ्य सुविधाओं और सरकारी तंत्र में व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है। जाहिर है कि रक्त की जांच प्रकिया में लापरवाही बरती जा रही है, जो मरीजों की जान पर भारी पड़ रही है।

इससे सबसे ज्यादा थैलेसीमिया के मरीज प्रभावित हो रहे हैं, जिन्हें बार-बार रक्त चढ़ाने की जरूरत पड़ती है। ऐसे में जरूरी है कि रक्त जांच परीक्षण का दायरा बढ़ाया जाए और लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए, ताकि रक्तदान मरीजों के लिए हमेशा जीवनदान बना रहे।