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उत्‍तराखंड: जीत से बहुत खुश होने की जरूरत नहीं, कांग्रेस के सामने अब भी बड़ी चुनौतियां

बीजेपी की ओर से दांव-पेंच शुरू करने से पहले से ही उत्‍तराखंड सरकार संघर्ष कर रही थी। बीजेपी की वजह से कांग्रेस को खुद को पीडि़त दिखाने का मौका मिल गया।

Author May 12, 2016 4:03 AM
हरीश रावत के फ्लोर टेस्‍ट में जीतने की जानकारी केंद्र सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दिए जाने के बाद समर्थकों ने रावत के घर के बाहर जमकर जश्‍न मनाया।

उत्‍तराखंड विधानसभा के शक्‍त‍ि परीक्षण में कांग्रेस को मिली जीत से पार्टी के हौसले में थोड़ा बहुत इजाफा होगा। बीजेपी के अक्‍खड़पन और उसके आर्टिकल 356 के इस्‍तेमाल में दिखाई गई जल्‍दबाजी के अलावा शक्‍त‍ि परीक्षण की प्रकिया पर सुप्रीम कोर्ट की निगरानी ने कांग्रेस को थोड़ेे वक्‍त की राहत दी है। हालांकि, कांग्रेस को यह अच्‍छी तरह से समझना होगा कि विरोधी की गलती उनकी रणनीति का विकल्‍प नहीं बन सकता। सच्‍चाई यही है कि कांग्रेस में लंबे वक्‍त से चली आ रही समस्‍या अभी भी गंभीर रूप से बनी हुई है। अभी भी इस बात की संभावना कम है कि पार्टी अपनी चुनौतियों के मुताबिक आगे के लिए रणनीति बनाएगी।

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कांग्रेस की पहली चुनौती खुद उत्‍तराखंड है। बीजेपी ने भले ही जल्‍दबाजी में काम किया, लेकिन इस बात के प्रमाण बहुत कम हैं कि राज्‍य में कांग्रेस लोकप्रियता की लहर पर सवार थी। बीजेपी की ओर से दांव-पेंच शुरू करने से पहले ही उत्‍तराखंड सरकार संघर्ष कर रही थी। बीजेपी की वजह से कांग्रेस को खुद को पीडि़त दिखाने का मौका मिल गया। हालांकि, यह विवाद कांग्रेस की बड़ी ढांचागत समस्‍या की ओर इशारा करता है। इस बात की संभावना बेहद कम है कि कांग्रेस किसी भी एक प्रदेश को गुड गवर्नेंस के उदाहरण के तौर पर पेश कर पाए। एक राष्‍ट्रीय पार्टी के लिए यह अभूतपूर्व होगा कि जब वो आम चुनाव में जाए तो उसके पास कामयाबी के चेहरे के तौर पर दिखाने के लिए एक भी सीएम का विकल्‍प न हो। पूरे उत्‍तराखंड संकट से अगर कांग्रेस को कोई सीख लेनी चाहिए तो वह यही है कि उसे गवर्नेंस पर ध्‍यान देना होगा। राष्‍ट्रीय राजनीति के स्‍तर पर भले ही इसका ज्‍यादा असर न दिखे, लेकिन शासन की शोहरत पैदा करना ईंट से ईंट जोड़कर तैयार करने जैसी कवायद होती है।

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अंदरखाने में यह खबर चल रही है कि रणनीतिकार प्रशांत किशोर को कांग्रेस में जगह दी गई है। उम्‍मीद है कि वे कड़े सवाल पूछ सकेंगे, जैसा कि पार्टी के भीतर के दब्‍बू स्‍वभाव के लोग पूछने से बचते रहे हैं। किशोर को लाने का फैसला इस बात का भी प्रमाण है कि कांग्रेस की नींद देर से खुली है। पॉलिटिक्‍स में कम्‍यूनिकेशन का तौर तरीका बड़े बदलावों से गुजरा है। उम्‍मीद है कि कांग्रेस अब कम्‍युनिकेशन के आदिम तौर-तरीकों से उबरेगी।

पार्टी की सबसे बड़ी समस्‍या यही है कि यह प्रथम परिवार से दूर नहीं रह सकती। उनके बिना किसी भी हालत में नहीं रह सकती। इस परिवार ने पार्टी पर जो सबसे बडा बोझ डाला है, वो करप्‍शन का ही है। यहां क‍रप्‍शन का मतलब निजी भ्रष्‍टाचार से नहीं है। इन मामलों पर फैसला कोर्ट को करना है। जांच में गांधी परिवार द्वारा खुद को राजनीतिक पीडि़त के तौर पर दिखाने की रणनीति बैकफायर कर सकती है।

कांग्रेस में राजनीतिक तौर पर भ्रष्‍टाचार की जो बू आती है, वो इसके जर्जर हो चुके दशकों पुराने शासन की वजह से है। वो शासन जिसमें कई लोगों को फायदा मिला और भ्रष्‍टाचार हुआ। दुर्भाग्‍य से यह छवि अब भी बनी हुई है। जब आप खुद को पुरातन शासन व्‍यवस्‍था के तौर पर पेश करते हैं, तो नए बदलाव के सिर्फ दो ही तरीके हैं। या तो आप माफी मांगें या ऐसा बर्ताव करें, जिससे इस बात का भरोसा पैदा हो कि आप बदल गए हैं या आपने अपने लोगों को बदल दिया है। फिलहाल कांग्रेस की ओर से ऐसा कुछ भी जाहिर नहीं किया जा रहा। गांधी परिवार ने एक दूसरे तरीके से भी कांग्रेस को भ्रष्‍ट किया है। इसने अपने बेहद टैलेंटेड लोगों की हैसियत और कद को कमतर किया। केंद्रीकृत स्‍वभाव वाली पार्टी लीडरशिप पैदा करने में असमर्थ रही।

राजनीति में बहुत कुछ हालात पर निर्भर करता है। अगर देश की अर्थव्‍यवस्‍था खस्‍ताहाल होती है और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण एक सीमा के बाहर होता है तो कांग्रेस को मौका मिल सकता है। चुनौती यह है कि पहली संभावना बेहद कम है। भले ही सरकार की ओर से किए जा रहे बड़े बड़े दावे सही न हों, लेकिन यह सोचने के लिए कई वाजिब कारण हैं कि देश की इकोनॉमी सही दिशा में है और 2017 और 2018 में उसकी तेज रफ्तार दिख सकती है। जहां तक कि ध्रुवीकरण की बात है, कांग्रेस इस कार्ड का इस्‍तेमाल तभी कर सकती है जब बीजेपी गल्‍त‍ियां करे।

उत्‍तराखंड विवाद के बाद कांग्रेस को बहुत ज्‍यादा खुश होने की जरूरत नहीं है। उसे यह महसूस करने की जरूरत है कि पार्टी में अब भी निराशा का दौर है। इससे उबरने के लिए बड़े पैमाने पर संगठनात्‍मक कोशिश, विचारधारा में बदलाव, फैसले लेने लायक नेतृत्‍व और राजनीतिक इच्‍छाशक्‍ति‍ की जरूरत होगी। चुनाव अभी बहुत दूर हैं, लेकिन आने वाले दो साल पार्टी के लिए बेहद अहम साबित होने वाले हैं।

(लेखक सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च दिल्‍ली के प्रेसिडेंट और ‘द इंडियन एक्‍सप्रेस’ के कॉन्‍ट्रीब्‍यूटिंग एडिटर हैं।)

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