जिस दौर में विज्ञान की उपलब्धियों के सहारे आम जनजीवन की समूची बुनियाद बदलने की एक प्रक्रिया चल रही है, उसमें महज अंधविश्वास की वजह से किसी की जान चली जाए या लोग अंधविश्वास की जड़ता में डूबे हों, तो इससे बड़ी विडंबना और क्या होगी।
उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले में बीते मंगलवार को मानसिक रूप से बीमार एक महिला की मौत इसका उदाहरण है कि हम लाख अपनी वैज्ञानिक उपलब्धियों का हवाला देते रहें, समाज का एक बड़ा हिस्सा आज भी अंधविश्वास की कूपमंडूकताओं में डूबा हुआ है और इसके बेहद तकलीफदेह खामियाजे भी भुगत रहा है।
हैरान करने वाली इस घटना में महिला को इलाज के नाम पर दस दिनों तक खंभे से बांधकर रखा गया, जिससे उसकी तबीयत बिगड़ गई। इसके बाद उपचार के लिए उसे स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया, जहां चिकित्सकों ने उसे मृत घोषित कर दिया।
अगर महिला के परिजनों या वहां के लोगों के बीच बीमारी और इलाज की सामान्य जानकारी भी होती, तो वे महिला को उपचार के लिए किसी चिकित्सक के पास ले जाते और उसकी जान बच सकती थी।
आज भी झाड़-फूंक के सहारे इलाज का अंधविश्वास कायम है, तो आखिर इसकी जड़ें कहां मौजूद हैं? आम लोगों की अमूमन हर गतिविधि को किसी तकनीक पर निर्भर करने और डिजिटल दुनिया के दौर में भी लोगों के ज्ञान का दायरा इतना सिमटा हुआ क्यों है कि वे किसी बीमारी का इलाज झाड़-फूंक या तंत्र-मंत्र में ढूंढ़ते हैं?
कई बार मानसिक रोगी का मनोचिकित्सक से उपचार नहीं कराया जाता और परिवार के सदस्य ही उसे तांत्रिक के पास ले जाते हैं। समाज से अधिक यह सरकार के लिए चिंता का विषय होना चाहिए कि देश में मानसिक रोग के उपचार के लिए पर्याप्त अस्पताल और चिकित्सक क्यों नहीं हैं।
मानसिक स्वास्थ्य को लेकर ज्यादातर लोगों का जागरूक न होना भी एक बड़ी चुनौती है। हैरानी की बात यह भी है कि तेज रफ्तार आधुनिक संचार के इस दौर में सरकार जहां अपनी किसी बात या प्रशासनिक फैसले को लागू करने वाले तंत्र को बिना किसी देरी के दूरदराज के इलाकों तक भी पहुंचा देती है, वहीं वह अंधविश्वास की जकड़न से घिरे लोगों के बीच वैज्ञानिक चेतना की रोशनी क्यों नहीं पहुंचाती?
