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संपादकीयः जांच की यातना

अगर भ्रष्टाचार के आरोप में पकड़े गए किसी व्यक्ति की निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत जांच के बजाय उसे ऐसी शारीरिक-मानसिक यातना दी जाती है कि उसके समूचे परिवार को आत्महत्या का रास्ता अख्तियार करना पड़े तो इस पर सवाल उठने लाजिमी हैं।

Author September 30, 2016 3:56 AM

अगर भ्रष्टाचार के आरोप में पकड़े गए किसी व्यक्ति की निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत जांच के बजाय उसे ऐसी शारीरिक-मानसिक यातना दी जाती है कि उसके समूचे परिवार को आत्महत्या का रास्ता अख्तियार करना पड़े तो इस पर सवाल उठने लाजिमी हैं। हिरासत में पूछताछ के नाम पर आरोपियों के साथ क्रूरता का बर्ताव पुलिस या दूसरी जांच एजेंसियों का शायद चरित्र बन गया है। वाणिज्य मंत्रालय में महानिदेशक पद पर रहे बीके बंसल नौ लाख रुपए रिश्वत लेने के आरोप में पकड़े गए थे। वे दोषी सिद्ध होते और उन्हें सजा मिलती, तो उस पर शायद ही किसी को एतराज होता। मगर वे कौन-से हालात पैदा हुए कि जब उनकी पत्नी और बेटी को कथित पूछताछ के लिए बुलाया गया तो उसके बाद उन दोनों ने खुदकुशी कर ली। अब खुद बीके बंसल और उनके बेटे ने भी अपनी जान दे दी। हो सकता है इन चारों की आत्महत्या को लोग शर्म से पैदा हुए तनाव से टूट जाने का नतीजा मानें। लेकिन मरने से पहले बीके बंसल के लिखे पत्र का जो मजमून सामने आया है, वह हैरान करने वाला है।

इस पत्र के ब्योरे को सही मानें तो इससे पुलिसिया तंत्र में फैली उस मानसिकता और कार्यशैली का पता चलता है, जिसमें न सिर्फ गिरफ्तार लोगों के प्रति संवेदना या उनके मानवाधिकारों का खयाल रखने की जिम्मेदारी का अभाव है, बल्कि पूछताछ के नाम पर यातना दी जाती है और कानूनी तकाजों को ताक पर रख दिया जाता है। आखिर सीबीआई के सामने किस तरह की अनिवार्यता आ गई थी, जिसके तहत जांच के क्रम में उसके अधिकारियों ने बीके बंसल की पत्नी को, पत्र के मुताबिक, बहुत थप्पड़ मारे, नाखून चुभोए और गंदी गालियों के अलावा मां और बेटी को मरने लायक बना देने की धमकियां दीं! पत्र में बीके बंसल ने सीबीआइ के कई अधिकारियों सहित डीआइजी संजीव गौतम के नाम लिखे हैं जो भाजपा अध्यक्ष अमित शाह का संरक्षण हासिल होने का दम भर रहे थे।

अब संभव है कि सीबीआइ इन बातों के निराधार होने की बात कहे। लेकिन एक समूचे परिवार के खुदकुशी कर लेने का आधार क्या केवल भ्रष्टाचार का आरोप हो सकता है? जिस दवा कंपनी से रिश्वत लेने के आरोप में सीबीआइ ने बीके बंसल को गिरफ्तार किया था, उसके मालिक अनुज सक्सेना की अग्रिम जमानत याचिका दो बार अदालत से खारिज होने के बावजूद सीबीआइ उसे गिरफ्तार नहीं कर सकी है। सक्सेना के पकड़ में न आने का सही कारण क्या होगा? भ्रष्टाचार कोई ऐसी समस्या नहीं है जो गिनती के कुछ लोगों तक सीमित हो। रिश्वतखोरी के समूची व्यवस्था में पसरे होने के तथ्य और अनुभव रोज सामने आते रहते हैं। बड़े कारोबारी बेजा फायदे के लिए किस तरह रिश्वत से लेकर लॉबिंग तक का सहारा लेते रहे हैं, यह छिपा नहीं रहा है। बीके बंसल इसी भ्रष्ट तंत्र का हिस्सा रहे होंगे। लेकिन उन्हीं के साथ ऐसा क्यों हुआ कि उनका समूचा परिवार खत्म हो गया? यह भ्रष्टाचार के प्रति संबंधित महकमों की नीतिगत सख्ती का उदाहरण नहीं हो सकता, क्योंकि यह एक विरल घटना है। इस मामले ने यह शक पैदा किया है कि सीबीआइ के भीतर सबकुछ ठीक-ठाक नहीं है।

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