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विरोधों का सामंजस्य

भारतीय जनता पार्टी और पीडीपी ने काफी ऊहापोह और कई दौर की आपसी बातचीत के बाद आखिरकार जम्मू-कश्मीर में सरकार बनाने के लिए गठजोड़ का एलान कर दिया। यह पहला मौका नहीं है, जब राज्य में कोई पार्टी अपने दम पर बहुमत हासिल नहीं कर पाई और साझा सरकार बनाने की जरूरत पड़ी हो। कांग्रेस […]

Author February 26, 2015 9:00 PM
भारतीय जनता पार्टी और पीडीपी ने काफी ऊहापोह और कई दौर की आपसी बातचीत के बाद आखिरकार जम्मू-कश्मीर में सरकार बनाने के लिए गठजोड़ का एलान कर दिया।

भारतीय जनता पार्टी और पीडीपी ने काफी ऊहापोह और कई दौर की आपसी बातचीत के बाद आखिरकार जम्मू-कश्मीर में सरकार बनाने के लिए गठजोड़ का एलान कर दिया। यह पहला मौका नहीं है, जब राज्य में कोई पार्टी अपने दम पर बहुमत हासिल नहीं कर पाई और साझा सरकार बनाने की जरूरत पड़ी हो। कांग्रेस से गठजोड़ करके नेशनल कॉन्फ्रेंस की अगुआई में वहां कई बार सरकार बनी है, पीडीपी और कांग्रेस भी सत्ता में साझेदारी कर चुकी हैं। लेकिन जम्मू-कश्मीर को लेकर भाजपा का नजरिया तमाम पार्टियों से भिन्न रहा है। इसलिए नेशनल कॉन्फ्रेंस या पीडीपी के साथ कांग्रेस का मेल जितनी आसानी से हो गया था, दोनों क्षेत्रीय पार्टियों में से किसी के साथ भाजपा के गठजोड़ की संभावना उतनी ही मुश्किल रही है। पर चुनाव नतीजों ने एक अपूर्व स्थिति पैदा कर दी। त्रिशंकु विधानसभा में जहां जम्मू से अधिकतर सीटें भाजपा को मिलीं, वहीं घाटी में पीडीपी को। यों पीडीपी ने जम्मू को भी जीतने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी थी, और भाजपा ने कश्मीरियों का भरोसा पाने के लिए। लेकिन इसमें दोनों पार्टियां नाकाम रहीं। लिहाजा, परिस्थिति ने उन्हें साथ आने के लिए विवश किया है।

यह विरोधों का सामंजस्य है, क्योंकि अनेक अहम मसलों पर दोनों पार्टियों के रुख में बड़ी खाई रही है। दोनों के गठजोड़ को अपने-अपने नजरिए से समझौते के रूप में भी देखा जा सकता है, और एक ऐसे अवसर के रूप में भी, जहां अतियों से बचते हुए जम्मू-कश्मीर में स्थायी शांति और खुशहाली का मार्ग प्रशस्त किया जा सके। साझा सरकार मुफ्ती मुहम्मद सईद की अगुआई में बनेगी और भाजपा के किसी विधायक को उपमुख्यमंत्री बनाया जाएगा। मंत्रालयों के बंटवारे को लेकर भी तस्वीर जल्दी ही साफ हो जाएगी। साझा सरकार में राज्य के दोनों प्रमुख हिस्सों के हितों का समान रूप से खयाल रखने का दबाव रहेगा, जो कि अच्छी बात होगी। पर उलझन जम्मू या घाटी के लिए विकास-कार्यक्रमों को लेकर नहीं, धारा 370, अफस्पा यानी सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम, पाकिस्तान और हुर्रियत से बातचीत और पाकिस्तान से आए शरणार्थियों को नागरिकता देने आदि मसलों को लेकर रही है। दोनों पार्टियों को यह चिंता सताती रही कि अगर वे अपने परंपरागत रुख से ज्यादा पीछे हटती दिखाई देंगी तो उन्हें राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ सकता है। लिहाजा, विवादास्पद मुद््दों पर बीच का रास्ता निकाला गया, और इसकी कवायद में कई बिंदुओं पर अस्पष्टता भी फिलहाल बनाए रखी गई है। भाजपा ने सभी पक्षों से बातचीत में हुर्रियत को शामिल करने का पीडीपी का आग्रह मान लिया है।

गठजोड़ के एजेंडे में धारा 370 के बारे में सीधा जिक्र नहीं है, पर उसके साथ कोई छेड़छाड़ नहीं होगी। भाजपा ने पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के शरणार्थियों को राज्य-सूची में रखने की बात मान ली है। ऐसा हुआ तो उन्हें संपत्ति और रोजगार के अलावा वोट देने का अधिकार भी होगा। मगर पश्चिमी पाकिस्तान से आए शरणार्थियों की बाबत ऐसी सहमति नहीं बन पाई, अलबत्ता मानवीय जरूरतों के आधार पर उनका भी खयाल रखने की बात कही गई है। जहां तक अफस्पा को हटाने का सवाल है, भाजपा इस बारे में कोई समयबद्ध वादा करने से बची है। स्थिति की समीक्षा की जाएगी और फिर चरणबद्ध तरीके से कदम उठाए जा सकते हैं। दो जलविद्युत परियोजनाओं और एक ताप बिजलीघर को राज्य को सौंपने, नियंत्रण रेखा के दोनों तरफ से लोगों के स्तर पर संपर्क और कारोबार की सुविधाएं बढ़ाने की पहल के लिए भी भाजपा सहमत हो गई है। इस तरह यह गठजोड़ राज्य में एक नए दौर की शुरुआत है। यह ज्यादा से ज्यादा सकारात्मक हो, इसके लिए जरूरी है कि पुराने अतिवादी तेवरों से बचा जाए।

 

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