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हंगामे की सूरत

संसद के मानसून सत्र में हंगामे और गतिरोध की संभावना पहले से दिख रही थी, खुद भाजपा ने उसे और बढ़ा दिया। पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कश्मीर में संकेत दिया कि संसद में विपक्ष से भिड़ंत तय है। फिर सत्र शुरू होने से एक दिन पहले भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने पार्टी के वरिष्ठ नेताओं और विवादों में घिरे मुख्यमंत्रियों की बैठक बुला कर रणनीति बनाई कि संसद में किसी भी रूप में झुकना नहीं है।

Author July 21, 2015 8:45 AM
संसद के मंगलवार से शुरू हो रहे मानसून सत्र के लिए भाजपा ने अपना रुख तय कर लिया है। पार्टी ने सुषमा स्वराज, वसुंधरा राजे और शिवराज सिंह चौहान से जुड़े विवादों पर रक्षात्मक नहीं होने का फैसला किया है। (फोटो: भाषा)

संसद के मानसून सत्र में हंगामे और गतिरोध की संभावना पहले से दिख रही थी, खुद भाजपा ने उसे और बढ़ा दिया। पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कश्मीर में संकेत दिया कि संसद में विपक्ष से भिड़ंत तय है। फिर सत्र शुरू होने से एक दिन पहले भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने पार्टी के वरिष्ठ नेताओं और विवादों में घिरे मुख्यमंत्रियों की बैठक बुला कर रणनीति बनाई कि संसद में किसी भी रूप में झुकना नहीं है।

आमतौर पर जब कभी संसद सत्र में गतिरोध की सूरत बनती दिखाई देती है तो सत्तारूढ़ दल विपक्षी दलों से कामकाज सुचारु ढंग से चलने देने की अपील करता है। विषम स्थितियों में सर्वदलीय बैठक भी बुलाता है। भरोसा दिलाता है कि उनके सवालों के माकूल जवाब दिए जाएंगे, उनकी मांगों पर उचित तरीके से विचार-विमर्श किया जाएगा। यही लोकतंत्र का तकाजा भी है। मगर भाजपा ने ऐसा नहीं किया। दरअसल, सरकार भूमि अधिग्रहण विधेयक और वस्तु एवं सेवा कर आदि से जुड़े विधेयकों को पारित कराने की हड़बड़ी में है। लोकसभा में चार और राज्यसभा में उसके नौ महत्त्वपूर्ण विधेयक अटके हुए हैं।

इसके अलावा उसका इरादा करीब ग्यारह नए विधेयक पेश करने का है। फिर सबसे बड़ी चुनौती व्यापमं घोटाले में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह, ललित मोदी को मदद पहुंचाने और सांठगांठ करने को लेकर विदेशमंत्री सुषमा स्वराज और राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे, सार्वजनिक वितरण प्रणाली में घोटाले को लेकर छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह, डिग्री को लेकर केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति इरानी, महाराष्ट्र सरकार में बाल विकास मंत्री पंकजा मुंडे आदि के मामले में विपक्ष के हमलावर रुख से निपटने को लेकर है।

मोदी सरकार पहले ही स्पष्ट कर चुकी है कि किसी भी मंत्री या मुख्यमंत्री को पद छोड़ने को नहीं कहा जाएगा, जबकि कांग्रेस इस बात पर अड़ी है कि जब तक दागी नेताओं का इस्तीफा नहीं लिया जाता, वह संसद नहीं चलने देगी। इस तनातनी में सरकार लोकसभा में भले कुछ कामकाज निपटाने में कामयाब हो जाए, पर राज्यसभा में मुश्किलें बढ़ गई हैं।

विचित्र है कि भाजपा अपने नेताओं के बचाव में इस तरह तन कर खड़ी हो गई है! व्यापमं घोटाले को लेकर लंबे समय से विरोध चल रहा है। इस मामले की जांच में मध्यप्रदेश सरकार का रवैया छिपा नहीं है। इस प्रकरण से जुड़े चालीस से ऊपर गवाहों और आरोपियों की संदिग्ध मौत विचलित करने वाली है। पर भाजपा अगर अब भी उस पर परदा डालने की कोशिश में जुटी है तो समझना मुश्किल है कि इससे उसे क्या हासिल होगा।

यूपीए सरकार के समय जब राष्ट्रमंडल खेल, दूर संचार स्पेक्ट्रम आबंटन, कोयला खदान आबंटन आदि में अनियमितताएं उजागर हुर्इं तो भाजपा ने सबसे अधिक आक्रामक रुख अख्तियार किया था। उस वक्त संबंधित दागी मंत्रियों, नेताओं को उनके पद से हटा दिया गया था। अब वही भाजपा सत्ता में आने के बाद नैतिकता का वह तकाजा कैसे भूल गई! संशोधित भूमि अधिग्रहण विधेयक, वस्तु एवं सेवा कर अधिनियम आदि पर वह अपना अड़ियल रवैया छोड़ने को तैयार नहीं दिख रही।

इस तरह प्रतिष्ठा का प्रश्न बना कर भाजपा अपने लोगों को बचाने और अपने गलत फैसलों को ढंकने की कोशिश करेगी तो उसकी किरकिरी बढ़ेगी ही। व्यवस्था शक्ति प्रदर्शन से नहीं, लोकतांत्रिक मूल्यों के दायरे में रह कर ही चलाई जाए तो गरिमापूर्ण होती है।

 

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