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संपादकीयः बेनामी के विरुद्ध

प्रधानमंत्री ने नोटबंदी की घोषणा के कुछ ही दिन बाद कहा था कि उनकी अगली मुहिम बेनामी संपत्ति के खिलाफ होगी। और अब यह सरकार की कार्रवाइयों में दिखने लगा है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

प्रधानमंत्री ने नोटबंदी की घोषणा के कुछ ही दिन बाद कहा था कि उनकी अगली मुहिम बेनामी संपत्ति के खिलाफ होगी। और अब यह सरकार की कार्रवाइयों में दिखने लगा है। आय कर विभाग ने छह महीनों में छह सौ करोड़ की बेनामी संपत्ति जब्त की है। यही नहीं, बेनामी संपत्ति रखने वालों के विरुद्ध कार्रवाई तेज करने के लिए आय कर विभाग ने देश भर में चौबीस बेनामी संपत्ति निषेध इकाइयों (बीपीयू) का गठन किया है। यों इस दिशा में पहल बेनामी लेन-देन निषेध कानून में संशोधन के साथ ही हो गई थी। संशोधित कानून पिछले साल एक नवंबर से लागू हो गया, जिसके तहत अधिकतम सात वर्ष की जेल और जुर्माने का प्रावधान है। पर सरकार के सामने पहली चुनौती नोटबंदी से पैदा हुई अफरातफरी से निपटना और बैंकों तथा बाजार के कामकाज को पटरी पर लाना था। इस चुनौती से पार पाते ही बेनामी संपत्ति सरकार के निशाने पर आ गई है। आय कर विभाग का दावा है कि उसने चार सौ से अधिक बेनामी सौदे पकड़े हैं और दो सौ चालीस मामलों में छह सौ करोड़ की संपत्ति जब्त की है। उसकी ताजा सक्रियता का प्रमाण उत्तर प्रदेश में डाले गए छापे हैं।
कई वरिष्ठ अफसरों के यहां डाले गए छापों में करोड़ों की संदिग्ध संपत्तियों का पता चला है।

पहली ही नजर में यह सारी कमाई आय के स्रोत से बहुत अधिक मालूम पड़ती है। महंगे इलाकों में चार-पांच फ्लैट, फिर फार्महाउस, बेशकीमती भूखंड, गहनों के रूप में ढेर सारा सोना, बैंक लॉकर, ढेर सारी नगदी। ये सब जायज कमाई के लक्षण नहीं हो सकते। बहुत सारे मामलों में अवैध कमाई की एक सामान्य परिणति बेनामी संपत्ति के रूप में होती है। मसलन, जबलपुर में एक ड्राइवर के पास 7.7 करोड़ की कीमत की जमीन पाई गई, जबकि वास्तव में वह संपत्ति मध्यप्रदेश की एक सूचीबद्ध कंपनी की है जहां वह काम करता है। इसी तरह राजस्थान के सांगानेर में एक सर्राफा व्यवसायी ने अपने पूर्व कर्मचारी के नाम पर नौ अचल संपत्तियां रखी थीं। आय कर विभाग ने कोलकाता में फर्जी कंपनियों से खरीदी गई कुछ संपत्तियां भी जब्त की हैं। यों वरिष्ठ अधिकारियों को अपनी संपत्ति का विवरण देने का निर्देश कभी केंद्र सरकार की तरफ से तो कभी राज्य सरकार की तरफ से मिलता रहता है। पर अमल कितना होता है, यह उत्तर प्रदेश के उदाहरण से जाहिर है जहां समय-सीमा कई बार बढ़ाए जाने के बावजूद बहुत कम अफसरों ने अपनी संपत्ति के बारे में सूचना दी। आनाकानी की वजह क्या रही होगी यह छापों से जाहिर है। सवाल है कि चौंधिया देने वाली यह अवैध कमाई आती कहां से है?

सरकारी योजनाओं में व्याप्त भ्रष्टाचार और विभिन्न कामों के लिए होने वाले लेन-देन, सरकारी ठेके तथा सरकारी खरीद और अधीनस्थों की पदोन्नति व तबादले आदि नौकरशाहों के जाने-पहचाने चरागाह हैं। लिहाजा इन कामों की प्रक्रियाओं को पारदर्शी बनाने तथा जवाबदेही सुनिश्चित करने के पुख्ता तरीके सोचने होंगे। आय कर विभाग के छापों में बड़ी मात्रा में नकदी भी बरामद हुई। मसलन, एक अफसर के यहां से नब्बे लाख और एक अन्य अफसर के यहां बीस लाख रुपए नकद मिले। नोटबंदी से उम्मीद की गई थी कि नकदी में काला धन जमा करने का सिलसिला थम जाएगा। लेकिन क्या नए नोटों में काला धन फिर से जमा होने लगा है! सरकार बेनामी संपत्ति के खिलाफ सक्रिय हुई है, अच्छी बात है। उसे फर्जी या मुखौटा कंपनियों के खिलाफ भी कार्रवाई तेज करनी चाहिए। काले धन से निपटने के लिए शेयर बाजार में पहचान छिपा कर पैसा लगाने की सहूलियत देने वाले पी-नोट के प्रावधान को खत्म करने का सुझाव कई बार आ चुका है। सरकार को इस पर भी सोचना चाहिए।

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