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संपादकीयः असम में विषम

असम की राजनीति में कमल को खिलता देखने के लिए भाजपा अरसे से उतावली रही है। आगामी विधानसभा चुनाव के लिए असम गण परिषद (अगप) के साथ उसका गठबंधन इसी उतावली का प्रतिफल है।

Author March 4, 2016 3:08 AM
(फाइल फोटो)

असम की राजनीति में कमल को खिलता देखने के लिए भाजपा अरसे से उतावली रही है। आगामी विधानसभा चुनाव के लिए असम गण परिषद (अगप) के साथ उसका गठबंधन इसी उतावली का प्रतिफल है। दोनों पार्टियों ने घोषणा की है कि इस साल अप्रैल या मई में होने वाला राज्य विधानसभा का चुनाव वे मिल कर लड़ेंगी। उन्होंने इस गठबंधन को ‘प्रदेश के व्यापक हित में’ और ‘कांग्रेस के भ्रष्ट कुशासन से जनता को मुक्ति दिलाने के लिए जरूरी’ बताया है। इससे पहले जनवरी में भी भाजपा बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट के साथ चुनावी तालमेल का एलान कर चुकी है। इन दोनों क्षेत्रीय पार्टियों के साथ गठबंधन से जाहिर है कि भाजपा दिल्ली और बिहार के विधानसभा चुनावों में मिली करारी हार से सबक लेकर असम में कोई जोखिम नहीं मोल लेना चाहती।

वह प्रदेश में वोटों का बंटवारा और अपने विरुद्ध राजनीतिक शक्तियों का ध्रुवीकरण नहीं होने देना चाहती। खासकर उन राज्यों में जहां उसकी जड़ें मजबूत नहीं हैं, चुनाव-पूर्व गठबंधन करने से भाजपा को कोई परहेज नहीं रहा है। फिर असम का मुकाबला तो त्रिकोणीय होने के आसार हैं और ऐसे मुकाबलों को वह अपने लिए फायदेमंद मानती रही है। गौरतलब है कि असम में तरुण गोगोई के नेतृत्व में पंद्रह साल सत्ता में रहने के बावजूद सत्ता-विरोधी रुझान की परवाह न करते हुए कांग्रेस ने सभी सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया है। इसके अलावा प्रदेश की मुसलिम बहुल सीटों पर पकड़ रखने वाला यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट भी साठ सीटों पर उम्मीदवार उतार रहा है। देखना दिलचस्प होगा कि इस तिकोनी लड़ाई में चुनावी ऊंट को अपनी तरफ हांक ले जाने की तिकड़में मतदाताओं पर कितना असर कर पाती हैं।

असम में भाजपा के चुनावी गठबंधन करने का एक बड़ा कारण यह भी है कि इस साल जिन पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं उनमें सबसे ज्यादा सफलता की उम्मीद उसे असम में ही है। पिछले लोकसभा चुनाव में राज्य की चौदह में से सात सीटों पर मिली जीत से ये उम्मीदें परवान चढ़ी हैं। राज्य के लखीमपुर लोकसभा क्षेत्र के अपने सांसद सर्बानंद सोनोवाल को पहले खेल एवं युवा मामलों का मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) बना कर और फिर पार्टी की ओर से उन्हें मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करके भाजपा ने साफ कर दिया है कि इन चुनावों में जीत के लिए वह कितनी गंभीर है।

मजे की बात है कि हमारे यहां चुनावों में तमाम पार्टियां ऐसी गंभीरता दिखाती रहती हैं लेकिन मतदाता भी वोट देते समय अपनी गंभीरता दिखा कर इन पार्टियों को चौंकाते रहते हैं। अगप के साथ भाजपा ने पहले भी चुनावी गठबंधन किया है लेकिन उसे विशेष सफलता हासिल नहीं हो पाई थी। राज्य में 2011 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का वोट प्रतिशत 39.4 रहा था, जबकि भाजपा को केवल 11.5 फीसद वोट मिले थे। प्रदेश की चौंतीस फीसद मुसलिम आबादी को लुभाने के लिए भी सभी पार्टियां पुरजोर कोशिशें करती रहती हैं। सवाल है कि मतदाताओं को महज वोट बैंक समझने, जाति-संप्रदाय या क्षेत्रवाद को चुनावी नैया पार लगाने के लिए पतवार बनाने के पैंतरे हमारे राजनीतिक दल कब तक अपनाते रहेंंगे? जब वे अपने सिद्धांतों, नीतियों, आदर्शों पर अटल आचरण और जनहित की सतर्क पहरेदारी जैसी उपलब्धियों के आधार पर वोट मांगने जाएंगे तब निश्चय ही उन्हें जीत के लिए तिकड़मों का सहारा नहीं लेना पड़ेगा।

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