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संपादकीयः आतंक के खिलाफ

बिम्सटेक के मंच से आतंकवाद फैलाने वाले देशों को जो चेतावनी जारी की गई है, उसके दूरगामी संदेश हैं। काठमांडो में दो दिन तक चले बिम्सटेक शिखर सम्मेलन की समाप्ति पर सदस्य देशों ने जो साझा घोषणापत्र जारी किया, उसमें सबसे ज्यादा जोर आतंकवाद के खात्मे पर रहा।

Author September 3, 2018 12:47 AM
बिम्सटेक के मंच से आतंकवाद के खिलाफ जो आवाज बुलंद की गई है, उसे अब हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए।

बिम्सटेक के मंच से आतंकवाद फैलाने वाले देशों को जो चेतावनी जारी की गई है, उसके दूरगामी संदेश हैं। काठमांडो में दो दिन तक चले बिम्सटेक शिखर सम्मेलन की समाप्ति पर सदस्य देशों ने जो साझा घोषणापत्र जारी किया, उसमें सबसे ज्यादा जोर आतंकवाद के खात्मे पर रहा। इसमें स्पष्ट रूप से कहा गया है कि आतंकवाद दुनिया में शांति और सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बना हुआ है, इसलिए जरूरी है कि आतंकवाद को बढ़ावा देने वाले, उसका समर्थन करने वाले और आतंकियों को पैसा, हथियार और प्रशिक्षण देने वालों के मुल्कों की जवाबदेही तय की जाए। आतंकवाद के मुद्दे पर बिम्सटेक के मंच से पाकिस्तान जैसे देश को यह सीधी और खुली चेतावनी है। शिखर सम्मेलन में आतंकवाद चिंता का बड़ा विषय इसलिए भी बना, क्योंकि भारत लंबे समय से आतंकवाद का दंश झेल रहा है। इसलिए भारत की अगुआई में सब देश इस बात पर राजी हुए कि आतंकवाद और सीमापार से होने वाले संगठित अपराधों से मिल कर लड़ना होगा। बिम्सटेक के सदस्य देशों में भारत के अलावा नेपाल, भूटान, म्यामां, बांग्लादेश, श्रीलंका और थाईलैंड हैं। पाकिस्तान और मालद्वीव इस संगठन में शामिल नहीं हैं।

बिम्सटेक बंगाल की खाड़ी के इलाके में पड़ने वाले एशिया के बड़े और छोटे ऐसे देशों का समूह है जो तेजी से विकास के रास्ते पर बढ़ रहे हैं, लेकिन गंभीर चुनौतियों से भी जूझ रहे हैं। इक्कीस साल पहले इस समूह की स्थापना इसी लक्ष्य को ध्यान में रख कर की गई थी कि चहुंमुखी विकास के पथ बढ़ने के लिए सारे सदस्य देश एक-दूसरे की तकनीकी और आर्थिक मदद करेंगे। लेकिन जिस साझा संकट से सभी को जूझना पड़ रहा है वह आतंकवाद और सीमापार से होने वाली अवैध गतिविधियां हैं। बिम्सटेक की अब तक जितनी बैठकें हुई हैं, उनमें काठमांडो की यह बैठक इसलिए भी अहम रही है क्योंकि पहली बार इस बात को लेकर गंभीर चर्चा हुई है कि बढ़ती चुनौतियों के बीच इस समूह को कैसे प्रभावी बनाया जाए, ताकि क्षेत्र में शांति और शक्ति संतुलन में यह एक निर्णायक भूमिका अदा कर सके। यह वक्त की जरूरत भी है। ज्यादातर देशों को लंबी अवधि के लक्ष्यों को हासिल करना है, जिनमें शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं से लेकर तकनीकी और आर्थिक विकास तक शामिल हैं। इसके लिए सभी सदस्य देश राजमार्गों, रेलमार्गों और समुद्री मार्गों का नेटवर्क और साझा संचार नेटवर्क बनाने पर सहमत हुए हैं। इसमें कोई शक नहीं कि बिम्सटेक के सदस्य देश विकास के बूते ही वैश्विक मंचों पर अपनी मौजूदगी दर्ज करा सकते हैं।

भारत अब न सिर्फ दक्षिण एशिया में, बल्कि पूरे विश्व में उभरती ताकत है। लेकिन भारत दुनिया के उन चंद देशों में भी है जो लंबे समय से पड़ोसी देश के आतंक की मार झेल रहे हैं। पाकिस्तान के सीमापार आतंकवाद ने पिछले तीन दशकों में हजारों निर्दोष लोगों की जान ली है। भारत में जितने बड़े आतंकी हमले हुए, उन सबमें पाकिस्तान का हाथ रहा है। यह हकीकत किसी से छिपी नहीं है। जो सदस्य देश बिम्सटेक में हैं, तकरीबन वही देश सार्क में हैं। सार्क सम्मेलनों में भी आतंकवाद के मुद्दा उठता रहा है और पाकिस्तान को कड़े संदेश दिए जाते रहे हैं। चीन भी पाकिस्तान को जिस तरह से समर्थन और मदद दे रहा है, वह चिंता का विषय है। कश्मीर में अशांति फैलाने वाले आतंकी संगठनों को चीन अब स्टील के जैकेट मुहैया करा रहा है। इसलिए बिम्सटेक के मंच से आतंकवाद के खिलाफ जो आवाज बुलंद की गई है, उसे अब हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए।

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