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संपादकीयः समाज की सड़ांध

कहते हैं, जहां स्त्रियों का सम्मान नहीं होता, वह समाज सड़ने लगता है। हमारे देश में यह सड़ांध अब हर कहीं नजर आने लगी है। बिहार के सुपौल में जिस तरह बिगड़ैल युवाओं ने एक छात्रावास में घुस कर बारह-तेरह साल की लड़कियों की बेरहमी से पिटाई की, वह इसका ताजा उदाहरण है।

Author October 9, 2018 1:47 AM
अगर बिहार का समाज अपने युवाओं में स्त्रियों का सम्मान करने का संस्कार देने में नाकाम साबित हो रहा है, तो प्रशासन की जिम्मेदारी बनती है कि कानून के भय से उन्हें काबू में करे।

कहते हैं, जहां स्त्रियों का सम्मान नहीं होता, वह समाज सड़ने लगता है। हमारे देश में यह सड़ांध अब हर कहीं नजर आने लगी है। बिहार के सुपौल में जिस तरह बिगड़ैल युवाओं ने एक छात्रावास में घुस कर बारह-तेरह साल की लड़कियों की बेरहमी से पिटाई की, वह इसका ताजा उदाहरण है। वहां के कस्तूरबा विद्यालय में छठी से आठवीं कक्षा की लड़कियां छात्रावास में रहती हैं। पड़ोसी गांवों के युवा अक्सर वहां आकर उनके साथ छेड़खानी करते और छात्रावास की चारदीवारी पर अश्लील इबारत लिख दिया करते हैं। लड़कियों ने इसकी शिकायत स्कूल प्रशासन से की, पर उसने उन्हें चुप रहने की नसीहत दी। ऐसे में लड़कियों ने खुद इसका प्रतिवाद करना शुरू किया। शनिवार शाम को भी जब वे खेल रही थीं, तो एक युवक ने अश्लील हरकत की। लड़कियों ने उसे रोका। यह बात युवक को नागवार गुजरी। वह अपने करीब बीस दोस्तों को साथ लेकर आया और सबने मिल कर लड़कियों की बेरहमी से पिटाई की। करीब चालीस लड़कियां घायल हुईं। उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। लड़कियों पर इस तरह सामूहिक हमला करने का संस्कार जिस समाज ने दिया वह कैसा होगा, सोच कर हैरानी होती है।

इससे पहले बिहार में ही कुछ युवाओं ने एक महिला को नंगा करके सरेआम घुमाया था। मुजफ्फरपुर बालिका गृह में बच्चियों के यौन शोषण का मामला अभी लोग भूले नहीं हैं। यह समझना मुश्किल है कि यह समाज का कैसा मानस बन रहा है, जिसमें महिलाओं और छोटी बच्चियों के साथ खुलेआम हिंसा होती है और दोषी बेखौफ उसी समाज में रहते हैं। वहां का प्रशासन कैसा है, जिसका खौफ असामाजिक तत्त्वों में जैसे अब बचा ही नहीं। क्या वजह है कि लड़कियां अपने साथ होने वाली छेड़खानी की शिकायत करती हैं और स्कूल प्रशासन उनकी सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम करने के बजाय उन्हें चुप रहने की सलाह देता है। इससे यही जाहिर होता है कि असामाजिक तत्त्वों से निपटने में राज और समाज दोनों पंगु हो चुके हैं। बहुत सारे मामलों में समाज खुद दंड देता है, पर जब वह स्त्रियों के खिलाफ होने वाली हिंसा और बदसलूकी को नजरअंदाज करने लगता है, तो प्रशासन की ताकत भी कहीं न कहीं क्षीण हो जाती है। बिहार में यही हो रहा है। स्त्री सशक्तीकरण, बेटियों की शिक्षा, महिलाओं की सुरक्षा आदि के दावे तो बहुत किए जाते हैं, पर हकीकत यही है कि हमारे समाज का एक बड़ा तबका उनके प्रति तंग नजरिया रखता है।

नीतीश कुमार सरकार ने बिहार में सुशासन का श्रेय लेने में कोई कसर नहीं छोड़ी। पर क्या सुशासन का चेहरा ऐसा होता है कि उसमें स्त्रियों को नंगा घुमाया जाए, बच्चियों का यौन शोषण किया जाए और मनचले सरेआम लड़कियों को छेड़ें और प्रतिवाद करने पर छात्रावास के भीतर घुस कर मार-पीट करें! अगर नीतीश कुमार सचमुच सुशासन के पक्षधर होते, तो इस तरह वहां असामाजिक तत्त्व सक्रिय न होते, वे इतने बेखौफ न होते कि बच्चियों की पिटाई करें। इन घटनाओं से अंदाजा लगाया जा सकता है कि असामाजिक तत्त्वों के खौफ के चलते न जाने कितनी लड़कियां और महिलाएं अपने खिलाफ होने वाली हिंसा और अत्याचार पर मुंह बंद कर जाती होंगी। अगर बिहार का समाज अपने युवाओं में स्त्रियों का सम्मान करने का संस्कार देने में नाकाम साबित हो रहा है, तो प्रशासन की जिम्मेदारी बनती है कि कानून के भय से उन्हें काबू में करे।

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