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भ्रष्टाचार के विरुद्ध

बिहार और ओड़िशा सरकारों की तरफ से भ्रष्टाचार के खिलाफ किए गए विशेष प्रावधानों को सर्वोच्च अदालत ने सही ठहराया है।

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार।

बिहार और ओड़िशा सरकारों की तरफ से भ्रष्टाचार के खिलाफ किए गए विशेष प्रावधानों को सर्वोच्च अदालत ने सही ठहराया है। यह फैसला बहुत मायने रखता है क्योंकि इससे अन्य राज्यों में भी भ्रष्टाचार-विरोधी सख्त कानून बनाने का रास्ता साफ हुआ है। सर्वोच्च अदालत के फैसले की नजीर होने से अन्य राज्यों में भी इस तरह के कठोर प्रावधान की पहल हो सकती है या उसकी मांग उठ सकती है। गौरतलब है कि नीतीश कुमार सरकार ने 2009 में बिहार विशेष अदालत कानून नाम से एक विधेयक पेश किया था। विधेयक को विधानसभा की मंजूरी भी मिल गई। इस कानून के तहत भ्रष्टाचार के मामलों की सुनवाई के लिए विशेष अदालत गठित करने की व्यवस्था की गई।

राज्य सरकार के इस कदम को भ्रष्टाचार के विरुद्ध एक बड़ी पहलकदमी के तौर पर देखा गया। मगर इसके एक खास प्रावधान पर सवाल भी उठते रहे हैं। वह प्रावधान यह था कि मुकदमा लंबित रहने के दौरान भी आरोपितों की संपत्ति जब्त की जा सकती है। इस तरह का प्रावधान नवीन पटनायक सरकार पहले ही, 2006 में कर चुकी थी। दोनों राज्यों के संशोधित कानूनों को कुछ लोगों ने सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी थी, इस बिना पर कि फैसला आने से पहले ही किसी को दोषी नहीं माना जा सकता, इसलिए मामले के लंबित रहने के दौरान संपत्ति जब्त करना निहायत असंवैधानिक है। सैद्धांतिक तौर पर यह दलील सही मालूम होती है।

पर जैसा कि बिहार विशेष अदालत कानून, 2009 कहता है, आरोपित की संपत्ति प्रथम दृष्टया सबूत होने पर ही जब्त की जाएगी, वह भी विशेष अदालत की अनुमति से। फिर, इसमें यह भी प्रावधान है कि अगर आरोपित निर्दोष सिद्ध हुआ, तो उसकी संपत्ति मय ब्याज के लौटा दी जाएगी। ओड़िशा और बिहार, दोनों राज्यों के संबंधित कानूनों को सर्वोच्च अदालत के फैसले से एक और तार्किक आधार मिला है। अदालत ने कहा है कि इस कानून के प्रावधानों का निशाना वे व्यक्ति हैं जिन्होंने अपनी आय के ज्ञात स्रोत से अधिक संपत्ति अर्जित की है, जो उस अवधि का अपराध है, और ऐसा विशिष्ट अपराध नहीं है जहां भ्रष्टाचार की बाबत सबूत की जरूरत हो।

इन दोनों कानूनों ने भ्रष्टाचार से लड़ने में संबंधित सरकारों के हाथ मजबूत किए हैं। साथ ही सरकारी कर्मचारियों-अधिकारियों में कानून का खौफ पैदा किया है, क्योंकि होता यह आया है कि मुकदमे बरसों-बरस घिसटते रहते हैं और इस बीच आरोपितों की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता, बल्कि न्यायिक कार्यवाही में होने वाली अतिशय देरी उनके लिए सबूतों को कमजोर करने की गुंजाइश पैदा करती है। लेकिन इस विशेष कानून के बावजूद ओड़िशा में सालों-साल अवैध खनन का सिलसिला चला। अफसरों और कर्मचारियों के अपने स्तर पर होने वाली रिश्वतखोरी, हो सकता है, विशेष कानून के भय से कुछ कम हुई हो। लेकिन संगठित रूप से होने वाला भ्रष्टाचार तो तभी थम सकता है जब प्रबल राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाई जाए। आय से अधिक संपति के मामले में सीबीआइ छापे डालती आई है। बहुत सारे मामलों में वह सबूत भी जुटा लेती है। पर उसे कार्रवाई को आगे बढ़ाने यानी मुकदमा चलाने के लिए इक्का-दुक्का मामलों में ही समय से इजाजत मिल पाती है। दूसरी तरफ, अधिकतर राज्यों में लोकायुक्त कानून लचर हैं। लोकायुक्तों के पास अभियोजन की शक्ति नहीं है, वे शिकायत की जांच के लिए सरकारी एजेंसियों पर निर्भर हैं। ओड़िशा और बिहार के विशेष कानूनों पर सर्वोच्च अदालत की मुहर लगना खुशी की बात है, पर हमारा ध्यान भ्रष्टाचार से निपटने के लिए बने तंत्र के अधूरेपन की तरफ भी जाना चाहिए।

 

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