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इंसानियत की मिसाल

बिहार में मुजफ्फरपुर के अजीतपुर गांव में कुछ दिनों पहले हुई सांप्रदायिक हिंसा के बीच एक ऐसा उदाहरण भी सामने आया, जो सामाजिक सौहार्द पर मंडराते खतरे के इस दौर में भी इंसानियत पर भरोसे को बचाए रखता है। एक युवक का शव मिलने के बाद भारी भीड़ ने जब अल्पसंख्यक समुदाय की बस्ती पर […]

Author January 24, 2015 3:00 AM

बिहार में मुजफ्फरपुर के अजीतपुर गांव में कुछ दिनों पहले हुई सांप्रदायिक हिंसा के बीच एक ऐसा उदाहरण भी सामने आया, जो सामाजिक सौहार्द पर मंडराते खतरे के इस दौर में भी इंसानियत पर भरोसे को बचाए रखता है। एक युवक का शव मिलने के बाद भारी भीड़ ने जब अल्पसंख्यक समुदाय की बस्ती पर हमला बोल दिया और लोग जान बचाने के लिए इधर-उधर भाग रहे थे, तो गांव की एक वृद्धा शैल देवी और उनकी दो बेटियों ने पड़ोस के एक दर्जन मुसलिम समुदाय के लोगों को अपने घर में छिपा दिया। इसके बाद वहां आ धमकी हिंसक भीड़ को अपना, यानी हिंदू का घर बता कर उन्होंने किसी तरह दरवाजे से ही लौटा दिया।

यह अपनी जान को भी जोखिम में डालना था, क्योंकि अगर उस भीड़ को जरा भी भनक लग जाती तो शायद वह घर में छिपे लोगों के साथ-साथ उस वृद्धा और उसकी बेटियों को भी नहीं बख्शती। गौरतलब है कि इस हिंसा में अजीतपुर गांव के दो दर्जन से ज्यादा घरों को खाक कर दिया गया और पांच लोग जिंदा जला दिए गए। ऐसे विकट समय में भी शैल देवी और उनकी बेटियों ने इंसानियत के तकाजे को पूरा किया और लगभग दर्जन भर मुसलिम महिलाओं और बच्चों को मौत के मुंह से बचा लिया। स्वाभाविक ही जिंदा बच गए एक मुसलिम बुजुर्ग ने कहा कि शैल देवी हमारे लिए फरिश्ता बन कर आर्इं। बिहार के मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी ने शैल देवी की बहादुरी और इंसानियत के प्रति उनकी आस्था को सम्मानित करके एक स्वागतयोग्य पहल की।

इस मौके पर शैल देवी को दिए गए इक्यावन हजार और उनकी बेटियों को बीस-बीस हजार रुपए की मदद निश्चित रूप से उनकी बहादुरी का एक प्रतीकात्मक स्वीकार है। मगर जब अपनी जान का जोखिम उठा कर इंसानियत में भरोसा बचाने वालों को समाज और सत्ता की ओर से सम्मानित किया जाता है तो यह बहुत सारे लोगों के लिए प्रेरणा का काम करता है। यह छिपा नहीं है कि ऐसे संवेदनशील मौकों पर अनेक लोग न चाहते हुए भी कई वजहों से अपने समुदाय की ओर से की जाने वाली हिंसा पर चुप्पी साध लेते हैं या घरों में दुबक जाते हैं।

मगर जैसा कि ऐसे मामलों में आमतौर पर होता है, जब शैल देवी के इस साहस की खबर हिंसा में लिप्त लोगों को लगी तो उन्होंने उन्हें इसका अंजाम भुगतने की धमकियां दीं। इस पर शैल देवी ने बहुत साधारण-सा सवाल समूचे समाज के सामने रखा कि हमने तो अपने गांव के ही लोगों की जान बचाई, इसमें कौन-सा जुल्म कर दिया, लोग कह रहे हैं कि अब तुम्हारी जान जाएगी! जाहिर है, अगर शैल देवी की हिम्मत के चलते उनपर खतरा मंडराने लगा है, तो अब सबसे बड़ी चिंता उनकी सुरक्षा की भी है।

सरकार ने शैल देवी की बहादुरी को सम्मानित किया है, मगर उनकी सुरक्षा के इंतजाम करना भी अब उसकी ही जिम्मेदारी है। यह अच्छी बात है कि स्थानीय प्रशासन ने शैल देवी को समाज के लिए मिसाल बताते हुए पूरी सुरक्षा मुहैया कराने की बात कही है। लेकिन असली चुनौती उस पूरे गांव और आसपास के इलाके में सांप्रदायिक सौहार्द और अमन-चैन बहाल करना है। अगर कोई तात्कालिक उपाय करके ताजा सांप्रदायिक हिंसा से उपजी स्थिति का हल मान लिया जाएगा तो यह भविष्य के लिए चिंताजनक होगा।

यह ध्यान रखना चाहिए कि सांप्रदायिक हिंसा की राजनीति करने वाले लोग ऐसे मौकों का इस्तेमाल कर लंबे समय तक के लिए समाज में दुराव और नफरत पैदा कर देते हैं, जिसका खमियाजा आखिर समाज को ही भुगतना पड़ता है।

 

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