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संपादकीयः बेलगाम जुबान

पिछले कुछ समय से बेतुकी बयानबाजियोंं का जैसे सिलसिला चल निकला है। यह केवल किसी खास व्यक्ति के मान-अपमान तक सीमित नहीं रह गया है।

Author March 3, 2017 3:06 AM
बिहार के उत्पाद एवं मद्य निषेध मंत्री अब्दुल जलील मस्तान।

पिछले कुछ समय से बेतुकी बयानबाजियोंं का जैसे सिलसिला चल निकला है। यह केवल किसी खास व्यक्ति के मान-अपमान तक सीमित नहीं रह गया है। ऐसे नेताओं की फेहरिस्त लंबी होती जा रही है, जो तात्कालिक राजनीतिक फायदे के लिए जनता को संबोधित करते हुए या फिर किसी दूसरे संदर्भ में ऐसी बात बोल जाते हैं, जिस पर तीखा विवाद खड़ा हो जाता है। ताजा मामला बिहार सरकार के एक मंत्री का है, जिन्हें नोटबंदी के मसले पर आम जनता के बीच केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री की आलोचना करते हुए यह भी ध्यान रखना जरूरी नहीं लगा कि उनके उकसावे पर साधारण लोगों के बीच कैसी प्रतिक्रिया हो सकती है। यह सही है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नोटबंदी से पैदा होने वाली समस्याओं के बाद कहा था कि पचास दिनों के भीतर सब ठीक हो जाएगा और अगर ऐसा नहीं हुआ तो वे कोई भी सजा भुगतने को तैयार हैं। मगर इसका मतलब यह नहीं है कि उस बयान के लिए उन्हें घेरते हुए व्यवहार और बातों के न्यूनतम तकाजों का भी ध्यान न रखा जाए।

दरअसल, कांग्रेस के नेता और बिहार सरकार में मंत्री अब्दुल जलील मस्तान ने पूर्णिया जिले में एक रैली के दौरान नोटबंदी से उपजी मुश्किलों के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जिम्मेदार बताते हुए उनके खिलाफ आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल किया और अपने भाषण में उकसाने वाली बातें कीं। नतीजतन, लोगों ने मोदी की तस्वीर के साथ अभद्र बर्ताव किया। मौजूदा समय में किसी की बात के बदले दूसरे को भी उसी स्तर पर जाकर अपमानित करने की जैसी होड़ लगी हुई है, उसमें भाजपा भी पीछे नहीं है। पर मस्तान की बातों से जुड़े एक वीडियो के फैल जाने के बाद बिहार में भाजपा ने इसे प्रतिष्ठा का मुद्दा बना लिया और मंत्री को बर्खास्त करने की मांग पर अड़ गई। इसके बाद विधानसभा की कार्यवाही में बाधा से लेकर टेबल-कुर्सी फेंकने जैसी प्रतिक्रिया सामने आई। मगर कांग्रेस ने इस मामले में भाजपा का रिकॉर्ड ज्यादा खराब बताते हुए मस्तान की बर्खास्तगी की मांग को बेतुका बताया। यह सही है कि अतीत में भाजपा के कई नेताओं ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और दूसरे कांग्रेसी नेताओं के खिलाफ आपत्तिजनक बयानबाजियां की हैं, लेकिन यह उनकी पार्टी के किसी सदस्य के बेलगाम बोल के बचाव का आधार नहीं हो सकता।

शायद यही वजह है कि मस्तान पर लगे आरोपों के बाद खुद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और राज्य कांग्रेस ने इस मसले पर खेद जाहिर किया। फिर मामले के तूल पकड़ने के बाद मस्तान ने भी माफी मांग ली। पर सवाल है कि एक जिम्मेदार पद पर होते हुए उन्हें इस बात का खयाल रखना जरूरी क्यों नहीं लगा कि प्रधानमंत्री की मर्यादा का ध्यान रखा जाना चाहिए? हालांकि मस्तान की बातों पर आपत्ति जताते हुए जिस तरह उन्हें ‘बांग्लादेशी’ और ‘देशद्रोही’ कह कर संबोधित किया गया, उससे यही जाहिर होता है कि भाजपा जिसके लिए मस्तान को कठघरे में खड़ा कर रही थी, वही काम वह खुद भी कर रही थी। दूसरी पार्टियों के कुछ नेता भी इस मामले में पीछे नहीं रहना चाहते हैं। सवाल है कि बेलगाम जुबान का यह सिरा कहां तक जाता है और कैसे रुकेगा! यह अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है कि इस तरह की प्रवृत्तियों का हमारी समूची लोकतांत्रिक प्रणाली पर कितना विपरीत असर पड़ रहा है!

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