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बिहार की बिसात

निर्वाचन आयोग ने बारह अक्तूबर से पांच नवंबर के बीच पांच चरणों में बिहार विधानसभा चुनाव कराने की घोषणा कर यह साफ कर दिया है कि उसकी प्राथमिकता स्वच्छ और निष्पक्ष मतदान है।

Author September 11, 2015 10:19 AM

निर्वाचन आयोग ने बारह अक्तूबर से पांच नवंबर के बीच पांच चरणों में बिहार विधानसभा चुनाव कराने की घोषणा कर यह साफ कर दिया है कि उसकी प्राथमिकता स्वच्छ और निष्पक्ष मतदान है। सही है कि बिना बाधा के चुनाव संपन्न कराने के लिए अलग-अलग चरणों में चुनाव कराना बेहतर उपाय है।

लेकिन करीब महीने भर चलने वाली चुनाव प्रक्रिया के दौरान आम जनता किन मुश्किलों से गुजरती है या सामान्य जन-जीवन पर इसका क्या असर पड़ता है, यह किसी से छिपा नहीं है। यही वजह है कि कई हलकों से चुनाव-प्रक्रिया को इतना लंबा न खींचने की मांग उठती रही है। आज राजनीति में आधुनिक तकनीक की भूमिका बड़ी हो चुकी है।

चुनाव प्रचार से लेकर मतदान तक में इस पर निर्भरता बढ़ती गई है। परंपरागत तौर-तरीके तेजी से पीछे छूटते जा रहे हैं। बिहार में दो मुख्य गठबंधन जिस तरह सुगठित तरीके से और नई तकनीकों के सहारे अभी से अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश में हैं, उसमें उनके जनता के बीच पहुंचने से लेकर चुनाव प्रचार तक की गति में काफी तेजी दर्ज की जा रही है। ऐसे में व्यवस्थागत पहलुओं को दुरुस्त और चाक-चौबंद रख कर इस चुनाव प्रक्रिया की अवधि को कम किया जा सकता था।

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इस बीच अभी से यह कयास लगाया जाने लगा है कि राज्य में अगली सरकार किसकी बनेगी। चुनाव की तारीख की घोषणा के साथ ही ‘सी-वोटर’ की ओर से कराए जनमत सर्वेक्षण में राजद-जद (एकी) के गठबंधन को भाजपा और उसके सहयोगी दलों के मुकाबले अच्छी स्थिति में और जीत के करीब बताया गया है।

दूसरी ओर, पिछले साल दिल्ली में बुरी तरह हार के बाद भाजपा के लिए बिहार का चुनाव एक तरह से अपनी राष्ट्रीय छवि बचाने का भी मामला है। इसलिए चुनाव की घोषणा के काफी पहले से प्रधानमंत्री सहित भाजपा के कई बड़े नेता लगातार अपना समीकरण मजबूत करने में लगे हैं। जबकि नीतीश कुमार और अब उनके साथ खड़े लालू प्रसाद के सामने सबसे बड़ी चुनौती राज्य में सत्ता बरकरार रखने के अलावा हर हाल में भाजपा को कमजोर करना है।

तीसरी ओर छह वामपंथी दलों का मोर्चा है, जिसका मकसद राज्य की राजनीति में अपनी उपस्थिति दर्ज कराना और अपने आधार को कसौटी पर परखना है। लेकिन अपने आधार समूहों के समर्थन को अगर यह मोर्चा वोट में तब्दील कर पाता है, तो इसका असर राजद-जद (एकी) गठबंधन को मिलने वाले मतों पर पड़ना तय है।

जाहिर है, बिहार में अभी तक की राजनीतिक तस्वीर के मुताबिक चुनाव में मुख्य रूप से तीन ध्रुव हैं। लेकिन घटनाक्रम इतनी तेजी से बदल रहा है कि अक्सर किसी खास राजनीतिक दल के अपने गठबंधन से बाहर होने या नए में जुड़ने की खबरें आ रही हैं।

ऐसे में निर्वाचन आयोग ने मतदानपूर्व और बाद होने वाले सर्वेक्षणों के प्रकाशन-प्रसारण आदि को लेकर सख्त नियम-कायदे जारी किए हैं, पर संचार माध्यमों के प्रसार वाले इस दौर में राजनीतिक अटकलबाजियों और अफवाहों पर अंकुश लगाना आसान नहीं रह गया है। बिहार में यों भी स्वच्छ और निष्पक्ष मतदान संपन्न कराना खासा पेचीदा काम रहा है। इसलिए निर्वाचन आयोग से अधिक मुस्तैदी की अपेक्षा स्वाभाविक है।

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