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संपादकीयः जहर का पैमाना

बिहार में शराबबंदी है। इसे लेकर वहां कड़े कानून हैं। इस पर निगरानी तंत्र को काफी मुस्तैद बनाया गया है।

Author October 30, 2017 2:18 AM

बिहार में शराबबंदी है। इसे लेकर वहां कड़े कानून हैं। इस पर निगरानी तंत्र को काफी मुस्तैद बनाया गया है। इसके बावजूद वहां जहरीली शराब पीने से चार लोगों की मौत की खबर निस्संदेह चिंताजनक है। हालांकि इस घटना के बाद कुछ लोगों को गिरफ्तार और कुछ अधिकारियों को निलंबित कर दिया गया है, पर इस घटना से बिहार में शराबबंदी पर सवालिया निशान तो लगा ही है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जिस तरह कड़े कानूनों के जरिए पूर्ण शराबबंदी को प्रभावी बनाने का दावा किया था, उसके विश्लेषण की जरूरत रेखांकित हुई है। जब नीतीश कुमार ने यह फैसला किया था, तो इसे उनके साहसिक कदम के तौर पर देखा गया था, क्योंकि शराबबंदी से सरकार को राजस्व का काफी नुकसान उठाना पड़ता है। मगर शराब के चलते हर साल जिस तरह लोगों के स्वास्थ्य पर खर्च बढ़ जाता है और हजारों घर बर्बाद हो जाते हैं, उस पैमाने से सरकार को शराब से मिलने वाले राजस्व का घाटा बहुत कम माना जाता है। इसलिए दूसरी राज्य सरकारों से भी ऐसे कदम उठाने की उम्मीद जताई गई थी। ऐसे में अगर बिहार सरकार का यह कदम विफल होता है, तो उससे न सिर्फ सरकार के फैसले पर, बल्कि शराब से होने वाली समस्याओं से पार पाने की योजनाओं पर अंगुलियां उठनी स्वाभाविक हैं।

बिहार पहला राज्य नहीं है, जहां पूर्ण शराबबंदी का फैसला किया गया। इसके पहले हरियाणा सरकार ने भी यह प्रयोग किया था। गुजरात में लंबे समय से शराबबंदी है। मगर शराबबंदी के अनुभवों से जाहिर है कि जब-जब और जहां-जहां ऐसे फैसले किए गए, वहां शराब माफिया सक्रिय हुआ। बल्कि कई बार देखा गया कि शराबबंदी के बाद नकली और देसी तरीके से तैयार की गई शराब की खपत बढ़ जाती है। बिहार में भी यही हो रहा है। यों शराब की बिक्री को लेकर आबकारी कानून हैं, नकली और चोरी-छिपे शराब बना कर बेचने वालों के खिलाफ कड़ी सजा के प्रावधान हैं, फिर भी यह कारोबार समांतर चलता रहता है। इसकी बड़ी वजह है कि आबकारी कानूनों पर अमल कराने वाला अमला इस पर नजर रखने में प्राय: शिथिलता बरतता है। बिना उसकी मिलीभगत के अवैध शराब बनाने और बेचने वाले अपना कारोबार नहीं चला सकते।

चोरी-छिपे बनाई जाने वाली शराब के अक्सर जहरीली होने का खतरा इसलिए होता है कि उसमें गुणवत्ता नियंत्रण की कोई व्यवस्था नहीं होती। ऐसी शराब बनाने वाले अक्सर नशा बढ़ाने के लिए उसमें नौशादर, स्पिरिट आदि ऐसी चीजें मिलाते हैं, जो स्वास्थ्य की दृष्टि से हानिकारक होता है। ऐसा नहीं माना जा सकता कि जहां गैर-कानूनी तरीके से शराब बनाई और बेची जाती है, वहां के स्थानीय लोगों और प्रशासन को उसकी भनक नहीं होती। बिहार के रोहतास जिले में जिस जगह जहरीली शराब पीने से लोगों की मौत हुई, वहां भी शराब की उपलब्धता की जानकारी लोगों को रही होगी, पर समय रहते प्रशासन ने उस पर अंकुश लगाने का प्रयास नहीं किया। अच्छी बात है कि इस पर निगरानी रखने के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई का फैसला किया गया है। इससे शायद दूसरे इलाकों में ऐसा कारोबार करने वालों को सबक मिले। फिर भी अगर बिहार सरकार पूर्ण शराबबंदी को लेकर सचमुच संजीदा है, तो उसे इस समस्या से पार पाने की अपनी तैयारियों पर एक बार फिर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है।

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