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सशक्तीकरण की राह

सरकारी सेवाओं में महिलाओं के लिए पैंतीस फीसद आरक्षण का प्रावधान कर बिहार सरकार ने साहसिक कदम उठाया है। हालांकि वहां पहले से पंचायतों में पचास फीसद और पुलिस भर्ती में पैंतीस फीसद आरक्षण महिलाओं के लिए है।

नई दिल्ली | January 21, 2016 12:04 AM
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार। (फाइल फोटो)

सरकारी सेवाओं में महिलाओं के लिए पैंतीस फीसद आरक्षण का प्रावधान कर बिहार सरकार ने साहसिक कदम उठाया है। हालांकि वहां पहले से पंचायतों में पचास फीसद और पुलिस भर्ती में पैंतीस फीसद आरक्षण महिलाओं के लिए है। अब नए फैसले के तहत सभी सरकारी सेवाओं में सभी पदों पर हर वर्ग की महिलाओं के लिए आरक्षण का प्रावधान किया गया है। इस तरह बिहार देश का पहला राज्य है, जहां नौकरियों में महिलाओं के लिए एक सुनिश्चित अनुपात तय किया गया है। चूंकि इसमें अलग-अलग वर्गों के लिए तय कोटे के भीतर ही महिलाओं के लिए अलग से सीटें आरक्षित रखने का प्रावधान है, इसलिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित आरक्षण की अधिकतम सीमा लांघने की नौबत नहीं आएगी। लिहाजा, कोई संवैधानिक अड़चन नहीं आनी चाहिए।

मसलन, अनुसूचित जाति के लिए निर्धारित सोलह फीसद, अनुसूचित जनजाति के लिए एक फीसद, अत्यंत पिछड़ा वर्ग के लिए अठारह फीसद, पिछड़ा वर्ग के लिए बारह फीसद और सामान्य वर्ग के लिए पचास फीसद के भीतर ही प्रत्येक में पैंतीस फीसद सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। यह स्त्री सशक्तीकरण की दिशा में बड़ा कदम है। संसद में महिलाओं के आरक्षण के मुद्दे पर लंबे समय से चले आ रहे गतिरोध के बरक्स भी बिहार सरकार का यह फैसला एक मिसाल बन सकता है। हालांकि इस बात को लेकर बहस हो सकती है कि सामान्य वर्ग की महिलाएं भले पढ़ाई-लिखाई के मामले में आगे हों, पर अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, पिछड़ा और अति पिछड़ा वर्ग में महिलाओं की शिक्षा का स्तर संतोषजनक नहीं है। इसके चलते उपयुक्त महिला प्रत्याशी न मिल पाने की स्थिति में उनके लिए आरक्षित पदों पर पुरुषों को बहाल करने के प्रावधान से अंतत: महिलाओं को कोई विशेष लाभ न मिलने की आशंका बनी रहेगी। मगर आरक्षण के प्रावधान से यह उम्मीद भी स्वाभाविक रूप से जगी है कि जिन वर्गों में बालिका शिक्षा पर जोर नहीं दिया जाता, उनमें इसके प्रति ललक बढ़ेगी।

हालांकि आरक्षण का लाभ उन्हीं लोगों की बच्चियों को अधिक मिल सकेगा, जो पहले से नौकरियों में रहते हुए पढ़ाई-लिखाई के मामले में आगे निकल चुके हैं और अपने वर्ग के अन्य लोगों की तुलना में बेहतर स्थिति में होते हैं। इस लिहाज से सरकार द्वारा बालिका शिक्षा की दिशा में बेहतर उपाय करने की जरूरत से इनकार नहीं किया जा सकता। जिन नौकरियों में प्रतियोगिता के जरिए जगह मिलती है, उनमें ज्यादातर वही बच्चे सफल देखे जाते हैं, जो अपेक्षाकृत अच्छे स्कूलों से पढ़ कर आए हैं। इसलिए आरक्षण के बावजूद अध्यापकों के अभाव और संसाधनों के स्तर पर बदहाल सरकारी स्कूलों से निकलने वाली बच्चियों के भविष्य को लेकर कोई दावा करना मुश्किल होगा। आज भी आर्थिक कमजोरी के चलते समाज की निम्न कही जाने वाली जातियों में लड़कियां तो दूर, लड़के भी उच्च शिक्षा तक मुश्किल से पहुंच पाते हैं। वे कम उम्र में ही घर का खर्च चलाने की जुगत में लग जाते हैं। जो लड़कियां पढ़-लिख भी जाती हैं, वे ऊंचे पदों के लिए पात्रता अर्जित नहीं कर पातीं। छोटे पदों तक ही उनकी पहुंच बन सकती है। ऐसे में बिहार सरकार को बालिका शिक्षा को बढ़ावा देने, बच्चियों के बीच में पढ़ाई छोड़ने की दर घटाने के उपाय जुटाने और सरकारी स्कूलों में पढ़ाई-लिखाई की बेहतर सुविधाएं मुहैया कराने पर भी ध्यान देने की जरूरत है।

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