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संपादकीयः बंद की मार

एक स्वस्थ लोकतंत्र तभी मजबूत रह सकता है जब किसी सत्ता के बरक्स विपक्षी समूहों को भी जनता से जुड़े मुद्दों पर अपनी राय जाहिर करने के निर्बाध मौके मिलें।

Author September 12, 2018 1:54 AM
क्या विरोध जताने के तरीके ऐसे नहीं हो सकते, जिसमें आम जनजीवन बाधित नहीं हो और लोगों को जागरूक करने के साथ-साथ सरकार को किसी मुद्दे पर जवाब देने के लिए बाध्य किया जा सके?

एक स्वस्थ लोकतंत्र तभी मजबूत रह सकता है जब किसी सत्ता के बरक्स विपक्षी समूहों को भी जनता से जुड़े मुद्दों पर अपनी राय जाहिर करने के निर्बाध मौके मिलें। आजादी के बाद पिछले सात दशकों के सफर के दौरान भारत का लोकतंत्र लगातार परिपक्व हुआ है और यहां अलग-अलग विचारों और धारा की राजनीति करने वाले समूहों ने इसमें पूरी भूमिका निभाई है। लेकिन इसके साथ ही कुछ मुद्दों पर राजनीतिक दलों की ओर से किए गए आंदोलनों के दौरान जिस तरह की अराजकता और हिंसा का माहौल देखा जाता है, उससे न केवल आम जनजीवन बाधित होता है, बल्कि कहीं न कहीं यह लोकतांत्रिक माहौल को भी नुकसान पहुंचाता है। सोमवार को विपक्षी दलों की ओर से पेट्रोल और डीजल की आसमान छूती कीमतों के विरोध में भारत बंद का आयोजन निश्चित रूप से आम लोगों की जरूरतों से जुड़े मुद्दे पर बुलाया गया था। अगर यह इस मसले पर जागरूकता फैलाने और सरकार के सामने वाजिब सवाल रखने के रूप में अपना संदेश छोड़ पाता तो लोकतंत्र के लिए ही बेहतर होता। लेकिन इस दौरान देश के कुछ हिस्सों से जिस तरह की हिंसा की खबरें आर्इं और व्यापक पैमाने पर जनजीवन बाधित हुआ, वह शायद बंद के घोषित मकसद में शामिल नहीं रहा होगा। सवाल है कि इस स्थिति का जिम्मेदार किसे माना जाएगा!

गौरतलब है कि पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों के मुद्दे पर विपक्षी दलों की ओर से आहूत बंद के दौरान देश के कई इलाकों में रोजमर्रा की सामान्य गतिविधियों पर असर पड़ा, शिक्षण संस्थानों को बंद रखना पड़ा और आम लोगों को आवाजाही में काफी दिक्कतें हुर्इं। हालत ऐसे हो गए कि कई राज्यों में आवाजाही पूरी तरह ठप पड़ गई और यहां तक कि आपात चिकित्सा वाले मरीजों को भी वक्त पर इलाज मिलने में मुश्किल हुई। हिंसा की ज्यादातर घटनाएं बिहार से सामने आर्इं, जहां सड़क और रेल यातायात को भी बाधित किया गया। दूसरे राज्यों में पुलिस की पहले से कई गई तैयारियों की वजह से व्यापक हिंसा की कोई घटना सामने नहीं आई, मगर लोगों को अपने जरूरी काम रोकने पड़े। यह ध्यान रखने की जरूरत है कि एक लोकतांत्रिक व्यवस्था के तहत चलने वाले देश में कोई आंदोलन अगर अराजकता का शिकार हो जाता है तो उसका मुख्य मुद्दा बेमानी हो जाता है। उस दौरान हुई हिंसा अपने पीछे कई बार तकलीफदेह हालात छोड़ जाती है, जिसे सामान्य होने में वक्त लगता है और नुकसान की भरपाई मुश्किल होती है।

मगर विडंबना यह है कि हमारे देश में राजनीतिक मुद्दों पर होने वाले ज्यादातर बंद के दौरान इसके आयोजकों को इन पहलुओं पर विचार करना शायद जरूरी नहीं लगता है। देश में आए दिन होने वाले बंद की घोषणा करने वाले राजनीतिक दल लोगों को अपने मुद्दों से सहमत कर पाएं या नहीं, लेकिन उनके लिए असुविधा की वजह जरूर बन जाते हैं। उस मुश्किल और तकलीफ के बारे में सिर्फ अंदाजा लगाया जा सकता है जिसमें किसी मरीज को आपात इलाज की जरूरत हो, लेकिन रास्ता बंद होने की वजह से उसे डॉक्टर तक नहीं पहुंचाया जा सका या फिर कोई परिवार बेहद जरूरी काम से निकला हो, मगर हिंसा की आशंका की वजह से वांछित जगह नहीं पहुंच सका और उसे कोई बड़ा नुकसान उठाना पड़ गया। ऐसे पीड़ित उस बंद के बारे में क्या राय बनाएंगे? लोकतंत्र में किसी मसले पर विरोध जाहिर करना एक स्वाभाविक राजनीतिक प्रक्रिया है। लेकिन क्या विरोध जताने के तरीके ऐसे नहीं हो सकते, जिसमें आम जनजीवन बाधित नहीं हो और लोगों को जागरूक करने के साथ-साथ सरकार को किसी मुद्दे पर जवाब देने के लिए बाध्य किया जा सके?

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