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संपादकीय: नरमी के संकेत

चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने तो यहां तक कहा कि बातचीत और मशविरे के जरिए प्रासंगिक मुद्दों को सुलझाने में दोनों ही पक्ष सक्षम हैं और किसी तीसरे पक्ष की दखलंदाजी की जरूरत नहीं है।

Author Published on: June 11, 2020 1:26 AM
india china border, india china news, india china border news,इस मामले में चीन की तरफ से अभी कोई जानकारी नहीं दी गई है। (फाइल फोटो)

पूर्वी लद्दाख में भारतीय और चीनी सैनिकों की वापसी की शुरुआत के बाद यह उम्मीद की जा सकती है कि सीमा पर चल रही तनाव की स्थिति अब खत्म होने की राह पर है। मौजूदा दौर में जब दुनिया एक महामारी से लड़ रही है और साधारण लोगों की जान बचाना सभी देशों की सरकारों का पहला दायित्व है, ऐसे में युद्ध या तनाव अपने आप में गलत दिशा में बढ़े कदम हैं। इसलिए यह वक्त का तकाजा और दोनों देशों के हित में है कि वे सीमा पर तनाव की स्थितियों को खत्म करें। इस लिहाज से देखें तो पिछले हफ्ते शुरु हुई शीर्ष स्तर के अधिकारियों के बीच बातचीत के अब सकारात्मक नतीजे सामने आने शुरू हो गए हैं।

इसके संकेत इस रूप में देखे जा सकते हैं कि वास्तविक नियंत्रण रेखा पर दोनों देशों के बीच सेना के मेजर जनरल स्तर की वार्ता के पहले चीनी और भारतीय सेनाओं ने गलवान, हॉट स्प्रिंग और गश्त के क्षेत्र पीपी- 15 से अपने कुछ सैनिक वापस बुला लिए और अस्थायी ढांचों को भी हटा लिया। दोनों ओर से सैनिक करीब ढाई किलोमीटर पीछे हटे। साफ है कि तनाव के गहराते जाने की खबरों के बीच द्विपक्षीय स्तर पर दर्शायी गई इस तरह की परिपक्वता ही हल का रास्ता है।

हालांकि करीब महीने भर पहले लद्दाख के पैंगॉन्ग यानी कॉनक्लेव झील और पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी के कुछ संवेदनशील इलाकों को लेकर उठाए गए ताजा विवाद का मकसद समझना मुश्किल है। इसके अलावा भी कुछ हिस्सों में चीन के गैरजरूरी दावों और कई बार अनधिकृत दखल की वजह से दोनों देशों के बीच अनावश्यक विवाद खड़े होते रहे हैं। लेकिन इस बार लद्दाख में जिस तरह चीनी सैनिकों ने बिना किसी उकसावे के अपनी सक्रियता दिखाई, उससे यही लगता है कि इसके पीछे चीन की कोई खास मंशा है।

यह समझने की जरूरत है कि किसी संप्रभु देश की सीमा पर गैरजरूरी तरीके से की गई किसी छोटी गतिविधि से अगर विवाद का रुख बिगड़ जाता है तो कई बार हालात बेकाबू हो जाते हैं। पिछले दिनों भारत और चीन के बीच हालात यहां तक पहुंच गए कि बिना न्योते के अमेरिका ने मध्यस्थता की पेशकश कर दी। लेकिन भारत और चीन ने जरूरी समझदारी के साथ अमेरिका के प्रस्ताव को खारिज कर दिया।

चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने तो यहां तक कहा कि बातचीत और मशविरे के जरिए प्रासंगिक मुद्दों को सुलझाने में दोनों ही पक्ष सक्षम हैं और किसी तीसरे पक्ष की दखलंदाजी की जरूरत नहीं है। भारत की ओर से भी अमेरिका को स्पष्ट कर दिया गया कि भारत और चीन के बीच विवाद सुलझाने की सैन्य और कूटनीतिक व्यवस्थाएं हैं।

सच यह है कि पड़ोसी और सीमा से एक दूसरे के साथ जुड़े होने के नाते यह भारत और चीन की जरूरत भी है कि आपस में शांति और सद्भाव बना रहे। खासतौर पर दोनों देशों के बीच अभी तक जैसे आर्थिक और दूसरे क्षेत्रों में संबंध रहे हैं, उसे देखते हुए इस तरह के छोटे तनाव कई बार दीर्घकालिक स्तर पर एक दूसरे के बारे में लिए जाने वाले फैसलों को प्रभावित करते हैं।

जहां तक सीमा क्षेत्रों में विवाद का सवाल है, तो यह किसी से छिपा नहीं है कि चीन अरुणाचल प्रदेश से लेकर कुछ अन्य हिस्सों में कैसा अतिक्रमण करता रहा है। क्या लद्दाख क्षेत्र में ताजा विवाद खड़ा करना इसी की कड़ी नहीं है? लेकिन जरूरत इस बात की है कि सीमा पर अनावश्यक सैन्य गतिविधियों के जरिए तनाव जैसी स्थिति पैदा करने के बजाय चीन भारत के साथ बातचीत से विवाद के स्थायी हल की ओर बढ़े।

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