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संपादकीयः खेल में पारदर्शिता

पिछले कुछ सालों के दौरान क्रिकेट की दुनिया में मैच फिक्सिंग और सट्टेबाजी से लेकर दूसरे कई तरह के विवाद सामने आए और उनमें बतौर संगठन बीसीसीआइ यानी भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड की जिम्मेदारियों को लेकर भी सवाल उठे।

Author October 9, 2018 1:48 AM
विधि आयोग ने साफ कहा था कि हर किसी को बीसीसीआइ से जुड़ी जानकारी मिल सके, इसके लिए जरूरी है कि इसका दर्जा एक जन-निकाय की तरह हो और इसे सूचनाधिकार कानून के दायरे में लाया जाए।

पिछले कुछ सालों के दौरान क्रिकेट की दुनिया में मैच फिक्सिंग और सट्टेबाजी से लेकर दूसरे कई तरह के विवाद सामने आए और उनमें बतौर संगठन बीसीसीआइ यानी भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड की जिम्मेदारियों को लेकर भी सवाल उठे। इसके मद्देनजर लगातार यह मांग उठाई जा रही थी कि प्रतियोगिताओं के आयोजन से लेकर तमाम गतिविधियों को पारदर्शी बनाने के लिए ठोस कदम उठाए जाएं और बीसीसीआइ को आरटीआइ यानी सूचना का अधिकार कानून के दायरे में लाया जाए। इन सवालों को सबसे पहले बीसीसीआइ की ओर से ही दरकिनार किया जाता रहा। लेकिन सोमवार को केंद्रीय सूचना आयोग ने बाकायदा यह आदेश जारी कर दिया कि बीसीसीआइ अब सूचना के अधिकार कानून के अंतर्गत काम करेगा। आयोग के इस फैसले के बाद बीसीसीआइ सूचनाधिकार कानून की धाराओं के तहत देश के लोगों के प्रति जवाबदेह होगा और उसे अपनी गतिविधियों से संबंधित मांगी गई जानकारी देनी होगी।

यह किसी से छिपा नहीं है कि बीसीसीआइ का संचालन चंद उद्योगपतियों और राजनीतिकों के हाथ में रहा है और ये लोग अपने निजी और कारोबारी हितों के लिए इसका इस्तेमाल करते रहे हैं। भ्रष्टाचार और कामकाज के तौर-तरीकों को लेकर बीसीसीआइ लंबे समय से विवादों में रहा है। इस मसले पर पूर्व न्यायाधीश आरएम लोढ़ा की अध्यक्षता में गठित समिति ने बोर्ड में गंभीर गड़बड़ियों को दर्ज किया था और उसे भ्रष्टाचार और राजनीतिक दखल से मुक्त करने के बारे में कई सिफारिशें दी थीं। लोढ़ा समिति ने भी कहा था कि बोर्ड एक सार्वजनिक संस्था है, लेकिन इसके फैसलों में पारदर्शिता और जवाबदेही की कमी है। हालांकि बोर्ड ने अब तक इस दलील पर खुद को आरटीआइ से बाहर रखने की बात कही थी कि यह एक निजी संस्था है। जबकि विधि आयोग ने अपनी रिपोर्ट में साफ कहा है कि बीसीसीआइ राज्य की एक संस्था के तौर पर काम करता है, उसे टैक्स में छूट और सस्ती जमीन से लेकर सरकार से हर तरह की मदद मिलती है। यही नहीं, अपने दायरे में होने वाले तमाम आयोजनों के मामले में बीसीसीआइ सरकार की तरह अपनी ताकतों का इस्तेमाल करता है।

सवाल है कि जब बोर्ड की स्थिति, प्रकृति और काम करने की विशेषताएं आरटीआइ कानून के प्रावधानों की धारा दो (एच) के तहत जरूरी शर्तों को पूरा करती हैं तो उसे इस दायरे में क्यों नहीं आना चाहिए? हालांकि इस तरह की मांग काफी पहले से हो रही थी कि देश के नाम पर उसके संसाधनों का इस्तेमाल करके क्रिकेट की समूची गतिविधियां संचालित करने वाले बीसीसीआइ को सूचनाधिकार कानून के दायरे में लाया जाए। बल्कि इससे संबंधित सुप्रीम कोर्ट के आदेश, विधि आयोग की रिपोर्ट और युवा व खेल मामलों के मंत्रालय के केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी की रिपोर्टों में भी बीसीसीआइ में पारदर्शिता सुनिश्चित करने की बाबत स्पष्ट सुझाव दर्ज किए गए हैं।

खासतौर पर विधि आयोग ने साफ कहा था कि हर किसी को बीसीसीआइ से जुड़ी जानकारी मिल सके, इसके लिए जरूरी है कि इसका दर्जा एक जन-निकाय की तरह हो और इसे सूचनाधिकार कानून के दायरे में लाया जाए। यों भी, जब अन्य खेल संघों की तरह बीसीसीआइ भी एक खेलसंघ ही है तो इसेसूचनाधिकार कानून से छूट मिलने का आखिर क्या औचित्य बनता है। जाहिर है, क्रिकेट आज दुनिया भर में जिस स्तर का खेल हो गया है और इसमें बीसीसीआइ की जितनी बड़ी भूमिका है, उसे देखते हुए आयोग का यह फैसला इसलिए भी स्वागतयोग्य है कि इसमें हर स्तर पर पारदर्शिता की जरूरत है।

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