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संपादकीयः रोजगार का आधार

पूंजीगत सामान की खपत को अमूमन नए निवेश का सूचक माना जाता है। राजग सरकार के दो साल में कई बार औद्योगिक उत्पादन में ठहराव के आंकड़े आए, वही हाल पूंजीगत सामान की खपत का भी रहा।

Author May 27, 2016 3:02 AM
Photo financial express

पूंजीगत सामान की खपत को अमूमन नए निवेश का सूचक माना जाता है। राजग सरकार के दो साल में कई बार औद्योगिक उत्पादन में ठहराव के आंकड़े आए, वही हाल पूंजीगत सामान की खपत का भी रहा। अलबत्ता जीडीपी की वृद्धि दर को संभालने में सरकार कामयाब रही है, पर इसमें अधिक योगदान सरकारी खर्चों और सरकारी खपत का रहा है, न कि निजी निवेश का। इस पृष्ठभूमि में पूंजीगत सामान संबंधी जिस नई नीति को सरकार ने मंजूरी दी है उसकी अहमियत समझी जा सकती है। प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में बुधवार को मंत्रिमंडलीय बैठक में लिए गए फैसले के मुताबिक नई नीति का उद्देश्य देश को विश्व-स्तरीय विनिर्माण केंद्र बनाना और 2025 तक 2.10 करोड़ अतिरिक्त अवसर सृजित करना है। साथ ही इसका मकसद समूची विनिर्माण गतिविधियों में पूंजीगत सामान का हिस्सा मौजूदा बारह फीसद से बढ़ा कर 2025 तक बीस फीसद करना है।

नई नीति में ‘मेक इन इंडिया’ का भी खयाल रखा गया है। नई नीति का एक मकसद यह भी है कि भारत के पूंजीगत सामान क्षेत्र में घरेलू उत्पादन का हिस्सा 2025 तक साठ फीसद से बढ़ा कर अस्सी फीसद और साथ ही इसके निर्यात को उत्पादन के मौजूदा सत्ताईस फीसद से बढ़ा कर चालीस फीसद किया जा सके। नई नीति की घोषणा ऐसे वक्त की गई, जब सरकार ने अपने दो साल पूरे किए हैं। पिछले दो साल में सरकार की अनेक उपलब्धियां गिनाई जा सकती हैं, उसी तरह कई नाकामियां भी। सरकार की एक प्रमुख नाकामी रोजगार के मोर्चे पर रही है। भारतीय जनता पार्टी ने हर साल दो करोड़ नई नौकरियां देने का वादा किया था। पर हाल यह है कि पिछले एक साल में नई सृजित नौकरियां किए गए वादे का दसवां हिस्सा भी नहीं हैं।

नए रोजगार के लिहाज से संतोषजनक आंकड़ा सड़क-निर्माण जैसे मुख्य रूप से सरकारी उद्यम और सौर ऊर्जा, दूरसंचार, फर्टिलाइजर जैसे इने-गिने क्षेत्रों तक सीमित रहा है। अर्थव्यवस्था के व्यापक क्षेत्र में रोजगार-सृजन नहीं हो रहा है। सरकार करीब सात फीसद की जीडीपी वृद्धि-दर के लिए अपनी पीठ थपथपाने में तनिक संकोच नहीं करती, पर सवाल है कि जीडीपी की यह दर रोजगार-वृद्धि में प्रतिफलित क्यों नहीं होती? मौजूदा विकास नीति के आलोचक रोजगार-विहीन विकास कह कर भी इसकी आलोचना करते हैं। क्या वैसा ही हाल नहीं दिख रहा है? सरकार ने पूंजीगत सामान का उत्पादन बढ़ाने का लक्ष्य तो तय कर लिया, पर सवाल है कि इसकी खपत कैसे होगी, अगर नया निवेश नहीं होगा? नए निवेश को तभी टिकाऊ प्रोत्साहन मिलेगा, जब बाजार में मांग बढ़े।

अंतरराष्ट्रीय बाजार में एक हद तक मंदी का आलम है, जिसके फलस्वरूप सत्रह महीनों से निर्यात का बुरा हाल है। पर निर्यात की सेहत सुधर भी जाए, तो केवल इसी के बल पर पूरी अर्थव्यवस्था की तस्वीर नहीं संवर सकती। वह तो तभी हो सकता है जब घरेलू बाजार में मांग बढ़े, और इसके लिए यह जरूरी है कि उनकी भी आमदनी में इजाफा हो जो क्रयशक्ति के लिहाज से हाशिये पर रहे हैं। इस कसौटी पर सरकार कहां खड़ी है, इसका अंदाजा सूखे के दौरान मनरेगा का पिछले साल का बकाया पैसा रोके रखने के उसके व्यवहार से लगाया जा सकता है। रोजगार-वृद्धि सरोकारों को सीमित रख कर नहीं हो सकती।

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