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शिकंजा और सवाल

देश में ऐसे उद्यमियों की एक बड़ी संख्या है जिन्होंने बैंकों से कर्ज लेकर उसे पूरी नेकनीयत से अपने कारोबार में लगाया लेकिन कड़े परिश्रम के बावजूद तय लक्ष्य तक नहीं पहुंच सके।

Author नई दिल्ली | March 15, 2016 2:31 AM
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया

बैंकों के डूबे हुए कर्ज की बढ़ती मात्रा पर अपने यहां चिंता तो बहुत जताई जाती रही है लेकिन उसकी वसूली के प्रयास नगण्य या दिखावटी ही अधिक रहे हैं। नतीजतन,बैंकों से भारी-भरकम कर्ज लेकर उसे जानबूझ कर न चुकाने वालों की संख्या लगातार बढ़ती गई है। इससे डूबे हुए कर्ज की रकम भी चार लाख करोड़ के पार चली गई है। इतनी बड़ी राशि डूबने के डर के बीच अब राहत की बात है कि देर से ही सही, हमारे कानून और विभिन्न नियामक एजेंसियों का शिकंजा बैंक कर्ज के बड़े बकाएदारों पर और आर्थिक अपराध करने वालों पर कसता जा रहा है। सरकार ने कहा है कि जानबूझ कर कर्ज न चुकाने वालों और गैरकानूनी आर्थिक गतिविधियों में लिप्त लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।

उधर भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने भी बड़ी कार्रवाई करते हुए पूंजी बाजार से एक हजार इकाइयों को प्रतिबंधित कर दिया है। इन्हें शेयर बाजार का दुरुपयोग करके पंद्रह हजार करोड़ रुपए से अधिक की कर-चोरी करने का दोषी पाया गया है। गौरतलब है कि शेयर बाजार में पारदर्शिता का अभाव तरह-तरह की अनियमितता और आर्थिक अपराधों के लिए उपजाऊ जमीन साबित होता रहा है। इस बाजार में सटोरियों द्वारा सूचीबद्ध कंपनियों के शेयरों में अवांछित तरीकों से कृत्रिम उछाल लाकर निवेशकों को भरमाने और फिर अचानक बिकवाली करके उनकी गाढ़ी कमाई हड़प कर खिसक लेने का खेल खूब चलता रहा है। कर-चोरी या ऐसी ही अन्य गतिविधियों को भी ज्यादातर मुखौटा कंपनियों या फिर कम कारोबार वाली छोटी कंपनियों के शेयरों के जरिए अंजाम दिया जाता है जिसका सेबी ने उचित ही संज्ञान लिया है। उसका यह कदम बैंकों से कर्ज लेकर उस रकम को पूंजी बाजार की अंधेरी सुरंगों की मार्फत अपनी गुमनाम तिजोरियों तक पहुंचाने के खेल को पूरी तरह बेशक न रोक पाए, कम तो जरूर करेगा।

रिजर्व बैंक ने भी इस राशि को वापस बैंकों की तिजोरियों में पहुंचाने के लिए मार्च 2017 तक ‘स्पष्ट बैलेंस शीट’ का लक्ष्य हासिल करने का प्रावधान किया है। उसके गवर्नर रघुराम राजन के अनुसार बैंकिंग क्षेत्र में ‘फंसी हुई पूंजी’ (स्ट्रेस्ड एसेट्स) को खत्म करना जरूरी है ताकि बैंक फिर से कर्ज देने की हालत में आ जाएं। इस फंसी हुई पूंजी की बाबत उन्होंने एक अहम बात यह कही कि कर्ज अदायगी न हो पाने के मामलों में बैंक अधिकारी वास्तव में कारोबारी जोखिम उठाने वालों और जानबूझ कर अनियमितता बरतने वाले कर्जदारों के बीच फर्क करें। असल में ऐसा करना तर्कसंगत भी है।

देश में ऐसे उद्यमियों की एक बड़ी संख्या है जिन्होंने बैंकों से कर्ज लेकर उसे पूरी नेकनीयत से अपने कारोबार में लगाया लेकिन कड़े परिश्रम और तमाम कौशल झोंक देने के बावजूद तय लक्ष्य तक नहीं पहुंच सके। वे वैश्विक मंदी या सरकारों की नीतिगत विफलताओं के शिकार होने के कारण सफल नहीं हो पाए और कर्ज चुकाने में असमर्थ रहे। इन्हें ऐसे कर्जखोरों से निश्चय ही अलग श्रेणी में रखा जाना चाहिए जो तमाम तिकड़में भिड़ा कर बैंकों से कर्ज लेने में सफल हो जाते हैं और फिर उस रकम को अय्याशी, शानो-शौकत या मनी लांड्रिंग आदि गैरकानूनी आर्थिक गतिविधियों में लगा कर चंपत हो जाते हैं। इससब के मद््देनजर सरकार को अपनी मौद्रिक नीतियों से लेकर राजकोषीय प्रबंधन और बैंकों की कार्यप्रणाली तक की गहन समीक्षा करके उनमें व्यापक सुधार लाने की जरूरत है।

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