अर्थव्यवस्था के आंकड़ों का हवाला देकर दिखाए जाने वाले विकास के सपने जब जमीनी हकीकत की कसौटी पर आंके जाते हैं, तब तस्वीर कई बार वही नहीं होती, जो बताई जाती है। जिस दौर में देश के दुनिया भर में चौथी अर्थव्यवस्था बन जाने के दावे किए जा रहे हैं, उसी समय ऐसी खबरें आईने की तरह सामने आ जाती हैं, जिनमें सबसे गरीब तबकों के बच्चे पेट भरने लायक खाना नहीं मिल पाने की वजह से कमजोर और बीमार होते हैं तथा इलाज के अभाव में दम तोड़ देते हैं।

गौरतलब है कि पिछले कुछ समय से मध्य प्रदेश के बालाघाट इलाके में लगातार आदिवासी बच्चों की मौत की खबरें आ रही हैं, लेकिन अब भी सरकार इसे गंभीरता से लेने को तैयार नहीं है। दरअसल, मई में ही वहां से बच्चों की मौत की खबरें आने लगीं, उसके बाद भी सरकारी तंत्र में कोई फिक्र नहीं देखी गई। मगर जब बच्चों की मौत का सिलसिला लगातार जारी रहा और सरकारी आंकड़ों के मुताबिक मरने वाले बच्चों की संख्या बत्तीस पहुंच गई, तो अब विपक्षी दल भी चिंता जताते हुए यह पूछ रहे हैं कि वहां सरकार कहां है!

सवाल है कि क्या इतनी संख्या में बच्चों की मौत से विचलित होना सरकार को इसलिए जरूरी नहीं लगा कि वे बेहद गरीब और आदिवासी समुदाय से आते थे! वरना क्या कारण है कि आए दिन सरकार की ओर से नई स्वास्थ्य योजनाओं के तहत आम नागरिकों को मुफ्त इलाज की सुविधा मुहैया कराने का दावा तो किया जाता है, मगर दूसरी ओर सिर्फ उपचार के अभाव में बच्चों के मरने का सिलसिला जारी रहता है।

इसी तरह, मुफ्त अनाज उपलब्ध करा कर कुपोषण दूर करने या किसी को भूखे पेट न मरने देने के दावे अब एक सामान्य-सी बात है, लेकिन सच्चाई यह है कि देश में आज भी बड़ी संख्या में लोग कुपोषण की वजह से ही कई गंभीर बीमारियों के शिकार हो जाते हैं। बालाघाट में जिन बच्चों की मौत की खबरें आईं, उसके पीछे दूषित पानी, कुपोषण और इलाज का अभाव जैसे कारण बताए गए हैं।

क्या सरकार को कभी यह सोचने की जरूरत पड़ती है कि हर मोर्चे पर विकास के चमकते आंकड़ों के बरक्स गरीब आदिवासी परिवार और उनके बच्चे कुपोषण तथा बीमारी के दुश्चक्र में क्यों दम तोड़ रहे हैं?