scorecardresearch

Morbi bridge :स्वत: संज्ञान!

गुजरात में एक सौ चालीस लोगों की जान लेने वाले मोरबी हादसे को लेकर अब अदालत सक्रिय हो गई है।

Morbi bridge :स्वत: संज्ञान!
मोरबी हादसे का हाई कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया था (पीटीआई फोटो)

गुजरात हाई कोर्ट ने पिछले हफ्ते इस हादसे पर स्वत: संज्ञान लिया था। अदालत ने मोरबी नगर पालिका को नोटिस जारी कर सोमवार तक कुछ सवालों के जवाब दाखिल करने को कहा था। लेकिन नगर पालिका ने सोमवार तक जवाब नहीं दिए, सो हाई कोर्ट ने फटकार लगा दी और कह दिया कि चौबीस घंटे में जबाव नहीं दिया तो एक लाख रुप्ए का जुर्माना लगा दिया जाएगा।

जवाब फिर भी दाखिल नहीं हुआ। नगर पालिका के वकील ने तर्क दिया कि नगर पालिका के प्रभारी और डिप्टी कलक्टर चुनाव डयूटी पर हैं, इसलिए ऐसा नहीं हो पाया। यानी अब तक कि स्थिति यह है कि तमाम फटकारों और चेतावनी के बावजूद मोरबी हादसे पर अदालती सुनवाई तेजी से आगे नहीं बढ़ पा रही है। बहरहाल यह बात सही साबित हो रही है कि हादसे हों या सरकारी लापरवाहियां या फर्जीवाड़े या भ्रष्टाचार के मामले, उनकी जांच पड़ताल और अदालती कार्यवाहियों में देर लगती या लगाई जाती है। लेकिन मोरबी हादसा बहुत ज्यादा गंभीर मामला है। लिहाजा उम्मीद की जानी चाहिए कि देर कितनी भी हो जाए, अंधेर नहीं हो पाएगा।


इतिहास की एक धरोहर के रूप् में खड़ा यह नायाब पुल इस साल 30 अक्तूबर को ढह गया था। इस हादसे में एक सौ चालीस लोग मर गए। इसी वजह से यह ज्यादा सुर्खियों में आया। मीडिया की पड़ताल में ऐसे अंदेशे जताए जाने लगे कि पुल की मरम्मत और जीर्णोद्धार के काम में भारी लापरवाही और अनियमितताओं के कारण पुल गिर गया। लेकिन हादसे के हफ्तेभर बाद तक इस मामले में ज्यादा कुछ होते नहीं दिखा।

उसी बीच मीडिया की कुछ खबरों पर अदालत की नजर चली गई और उसने संज्ञान लेते हुए खबर को एक जनहित याचिका मान लिया और इस पुल के रखरखाव की जिमम्मेदार नगर पालिका को नौ नवंबर को नोटिस जारी कर दिए। तब से यही इंतजार हो रहा था कि नगर पालिका के जिम्मेदार अफसर सवालों के जवाब देगें और पता चलेगा कि गड़बड़ कहां हुई।

लेकिन एक हफ्ता और गुजर गया, पर गड़बड़ी और उसे करने वालों को कठघरे में लाने का काम आगे नहीं बढ़ पा रहा है। हालांकि अदालत का रुख देख कर लग रहा है कि देर भले हो जाए, पर जिम्मेदार अफसरों या कर्मचारी या पुल के ठेकेदारों या मरम्मत के लिए हुए करार के दोषी पक्षकार बच नहीं पाएंगे।

अदालत के स्वत: संज्ञान से दाखिल हुई जनहित याचिका पर अब तक की कार्यवाही से कुछ सवाल जरूर खड़े हो गए हैं। हालांकि अदालत के इन सवालों के जवाब दाखिल होने के बाद ही यह पता चल पाएगा कि इस पुल की मरम्मत के काम के लिए कोई टेंडर हुआ था या नहीं। यह भी तभी पता चलेगा कि पुल के रखरखाव के लिए किस तरीके का ठेका या करार किया गया।

यह सवाल भी कम महत्त्व का नहीं है कि डेढ़ सौ साल पुरानी इस ऐतिहासिक धरोहर के मामले में किसी निजी कंपनी से अनुबंध का पूरा दस्तावेज सिर्फ डेढ़ पेज में ही कैसे निपट गया। अदालत ने गुजरात सरकार से यह भी पूछा है कि क्या उसने इस कंपनी को कोई ढील दे रखी थी। पुल ढह जाने के बाद ऐसे सवालों के जवाब दे पाना इतना आसान नहीं है क्योंकि यह मामला किसी गलती को सुधारने की गुंजाइश वाला नहीं है। यानी कसूरवारों को चेतावनियां या जुर्माना भर कर मामले को सुलटा देना आसान नहीं होगा।

पढें संपादकीय (Editorial News) खबरें, ताजा हिंदी समाचार (Latest Hindi News)के लिए डाउनलोड करें Hindi News App.

First published on: 17-11-2022 at 04:47:22 am
अपडेट