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जनसत्ता संपादकीय : आणविक गुत्थी

परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह यानी एनएसजी की सदस्यता के लिए स्विटजरलैंड के समर्थन की स्वीकृति से निस्संदेह भारत का पलड़ा कुछ भारी हुआ है।

Author नई दिल्ली | June 7, 2016 23:41 pm
काकरापार परमाणु ऊर्जा संयंत्र

परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह यानी एनएसजी की सदस्यता के लिए स्विटजरलैंड के समर्थन की स्वीकृति से निस्संदेह भारत का पलड़ा कुछ भारी हुआ है। अभी तक स्विटजरलैंड और मेक्सिको इस समूह में भारत की सदस्यता का इसलिए विरोध करते रहे हैं कि उसने परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्विटजरलैंड से मेक्सिको जाएंगे और उम्मीद है कि वहां से भी भारत को समर्थन मिल जाएगा। अमेरिका, ब्रिटेन, रूस और फ्रांस पहले से भारत का समर्थन करते रहे हैं।

अब बड़ी अड़चन केवल चीन है, जो भारत को एनएसजी की सदस्यता का खुला विरोध करता रहा है। वह पाकिस्तान को इसका सदस्य बनाना चाहता है। करीब बयालीस साल पहले भारत ने पहला परमाणु परीक्षण किया तब आणविक तकनीक पर नियंत्रण के मकसद से एनएसजी का गठन किया गया था। फिलहाल अड़तालीस देश इसके सदस्य हैं और नए देश को सदस्यता देने के लिए इन सभी की मंजूरी आवश्यक है। भारत ने सदस्यता के लिए आवेदन कर दिया है, जिस पर अगले दो दिनों में विचार किया जाना है। फिर इस महीने के अंतिम सप्ताह में यह प्रस्ताव स्वीकृति के लिए सदस्य देशों के सामने रखा जाना है। इसलिए भारत एनएसजी के तमाम सदस्य देशों को अपने पक्ष में करने का प्रयास कर रहा है। दरअसल, जलवायु परिवर्तन के चलते पैदा हुई स्थितियों में भारत के लिए पेट्रोलियम पदार्थों पर अपनी निर्भरता घटाना जरूरी हो गया है। इसके लिए एनएसजी की सदस्यता मिले बगैर भारत के परमाणु कार्यक्रमों को उचित गति नहीं मिल पाएगी। यही तर्क देकर वह चीन को अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रहा है।

मगर चीन के अपने स्वार्थ हैं। भारत को एनएसजी की सदस्यता मिल जाने के बाद उसके स्वार्थ नहीं सध पाएंगे। एनएसजी की सदस्यता मिलने के बाद दक्षिण एशिया में भारत की ताकत बढ़ जाएगी। इससे न सिर्फ भारत की अपनी ऊर्जा जरूरतें पूरी करने में मदद मिलेगी, वह निर्बाध रूप से यूरोनियम खरीद सकेगा, बल्कि वह परमाणु हथियार संपन्न देश भी बन जाएगा। अगर वह भविष्य में परमाणु परीक्षण करता है तो उसे आर्थिक दंड का भुगतान करने की बाध्यता नहीं होगी। उसे दूसरे देशों से अत्याधुनिक परमाणु हथियार और तकनीक प्राप्त हो सकेगी। यह सब पड़ोसी चीन को गवारा नहीं। अभी तक दक्षिण एशिया में उसने अपना वर्चस्व बना रखा है। पाकिस्तान में उसने अपनी परमाणु परियोजनाएं शुरू कर रखी हैं। इस तरह वह दक्षिण एशिया के परमाणु बाजार पर अपनी पकड़ बनाए रखना चाहता है।

भारत के एनएसजी का सदस्य बन जाने के बाद उसकी स्थिति वैश्विक स्तर पर मजबूत हो जाएगी। स्वाभाविक ही इससे चीन की ताकत कुछ कम हो जाएगी। इसलिए वह पाकिस्तान को एनएसजी का सदस्य बनाने के पक्ष में है। फिर अगर भारत इसका सदस्य बन जाता है तो पाकिस्तान की सदस्यता खटाई में पड़ जाएगी। तब पाकिस्तान को सदस्य बनाने के लिए भारत की मंजूरी की जरूरत भी पड़ेगी, जो कि आसान नहीं होगा। मगर कार्बन उत्सर्जन में कटौती के लिए जरूरी है कि भारत को आणविक ऊर्जा संपन्न देश बनाया जाए। औद्योगिक विकास के साथ-साथ भारत की ऊर्जा संबंधी जरूरतें लगातार बढ़ रही हैं। हालांकि सौर ऊर्जा के क्षेत्र में भारत ने काफी तेजी से विकास किया है, पर इतने भर से उसकी जरूरतें पूरी नहीं हो सकतीं। अभी पेट्रोलियम पर उसकी निर्भरता अधिक है। इसलिए एनएसजी में उसकी सदस्यता से इस समस्या का काफी कुछ हल संभव है।

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