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आतंक के हाथ

ऐसे वक्त जब सारी दुनिया आतंकवाद को लेकर चिंतित है, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जो मुद्दे उठाए हैं उन पर गौर किया जाना चाहिए।

Author November 23, 2015 10:18 PM

ऐसे वक्त जब सारी दुनिया आतंकवाद को लेकर चिंतित है, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जो मुद्दे उठाए हैं उन पर गौर किया जाना चाहिए। दसवें पूर्वी एशियाई शिखर सम्मेलन के मेजबान देश मलेशिया की राजधानी क्वालालंपुर में रविवार को भारतीय समुदाय को संबोधित करते हुए मोदी ने जहां आतंकवाद को मानवता के लिए सबसे बड़ा खतरा बताया, इसे धर्म से अलग करने का आह्वान किया और आतंकवाद से निपटने के लिए राजनीतिक समीकरण का विचार किए बिना वैश्विक एकजुटता की अपील की, वहीं इस समस्या के टेक्नोलॉजी से जुड़े पहलू की तरफ भी ध्यान खींचा। मोदी ने कहा कि हम खुफिया सूचनाओं का आदान-प्रदान कर सकते हैं, कानूनी व्यवस्था में सहयोग कर सकते हैं, पर यह भी सुनिश्चित किया जाए कि इंटरनेट आतंकियों की भर्ती का जरिया न बन पाए।

यों आतंकी समूहों की तकनीकी क्षमता पर काफी समय से चर्चा चल रही है, खासकर 9/11 के बाद से। मगर पेरिस हमले की जिम्मेवारी लेने वाले आइएस की तकनीकी दक्षता ने दुनिया को दहला दिया है। तकनीक में इतना माहिर इसके पहले शायद ही कोई और आतंकी संगठन रहा हो। आइएस ने अपना जाल फैलाने, भर्तियां करने और अपने समर्थकों को जोड़े रखने, अपने ‘कार्यकर्ताओं’ को निर्देश देने, अपने लक्ष्यों और धमकियों का प्रचार करने और मीडिया का ध्यान खींचने आदि के लिए इंटरनेट का खूब इस्तेमाल किया है। उसके पास क्रय-शक्ति की भी कमी नहीं है, क्योंकि सीरिया और इराक, दोनों के एक बड़े हिस्से पर उसका कब्जा होने से तेल के कई कुएं उसके नियंत्रण में हैं। बर्बरता, पैसा और तकनीक, इन तीनों के मेल ने आइएस को दुनिया का सबसे खतरनाक संगठन बना दिया है। इंटरनेट के जरिए ही उसने कई पश्चिमी देशों में भी छिपे समर्थक तैयार कर लिए हैं। पेरिस हमले के सिलसिले में चल रही जांच और धरपकड़ से भी यह जाहिर है।

निजी कंप्यूटर में दर्ज आंकड़ों और सूचनाओं की गोपनीयता या निजता को लेकर सारी दुनिया में नए सिरे से बहस खड़ी हुई है, तो उसका बड़ा कारण आतंकवादी संगठनों के द्वारा इंटरनेट का बढ़ता इस्तेमाल ही है। पल भर में जहां चाहें वहां सूचनाएं और संदेश भेजे जा सकते हैं, पल भर में पैसा कहीं से कहीं पहुंच जाता है। यों बम और बंदूक जैसे तरीकों से भी काफी खून बहा है। लेकिन 9/11 ने बता दिया कि अब ज्यादा खतरा नए किस्म के हमलावरों से है। यही नहीं, अब अंदेशा इस बात का भी है कि कहीं परमाणु बम या रासायनिक हथियार या जैविक हथियार आतंकियों के हाथ न लग जाएं या वे इन्हें बनाने में कामयाब न हो जाएं। आतंकवादियों की तरफ से साइबर हमले का भी खतरा जताया जाता है।

आतंकवादी पुराने तरीकों को काम में लाने के साथ ही अपनी साजिशों को और भयावह बनाने की कोशिश करते रहते हैं। लिहाजा, उनसे निपटने की रणनीति में सरकारों के लिए भी अत्याधुनिक तकनीकों का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल करना जरूरी होता गया है। उनकी तनिक ढिलाई और चूक किसी आतंकवादी संगठन को कहर ढाने का मौका दे सकती है। आज हर अंतरराष्ट्रीय मंच पर आतंकवाद से लड़ने का संकल्प दोहराया जाता है और इसके उपायों पर चर्चा होती है, तो इसीलिए कि आतंकवाद ने अंतरराष्ट्रीय शक्ल अख्तियार कर ली है। इसमें इंटरनेट उनके लिए सहायक साबित हुआ है। तकनीक में दोतरफा संभावना होती है। हमें सोचना होगा कि बुरी संभावना पर कैसे नकेल कसी जाए।

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