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संपादकीयः वहशी सलूक

बंगलुरु में एक तंजानियाई छात्रा से मारपीट और उसे निर्वस्त्र कर सड़क पर दौड़ाने से उन्मादी भीड़ का वहशी चेहरा फिर सामने आया है।

Author Published on: February 5, 2016 2:42 AM
आग के हवाले तंजानियाई छात्रा की कार

बंगलुरु में एक तंजानियाई छात्रा से मारपीट और उसे निर्वस्त्र कर सड़क पर दौड़ाने से उन्मादी भीड़ का वहशी चेहरा फिर सामने आया है। इस इक्कीस वर्षीय छात्रा का कसूर बस इतना था कि वह साथियों के साथ कार में उस इलाके से गुजर रही थी जहां दोपहर में एक सूडानी छात्र की कार से हुए हादसे में एक स्थानीय महिला की मौत हो गई थी। इस दुर्घटना के दोषी छात्र को हालांकि पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था लेकिन विवेक को तिलांजलि दे बैठी गुस्साई भीड़ ने तंजानियाई छात्रा को भी कसूरवार समझ कर न केवल उसकी कार को आग के हवाले कर दिया बल्कि कपड़े फाड़ कर सड़क पर उसकी परेड भी कराई।

पिटाई की पीड़ा और अपमान से आहत इस छात्रा ने बचने के लिए पास से गुजर रही बस में सवार होने की कोशिश की तो उसे बाहर खींच लिया गया। इसके बाद आटोरिक्शा में बैठ कर वहां से जाना चाहा तो ड्राइवर ने उसे बैठाने से मना कर दिया। हालांकि कर्नाटक के गृहमंत्री ने छात्रा के कपड़े उतार कर घुमाने की बात से इनकार किया है लेकिन इस शर्मनाक वारदात की जांच किए जाने और पांच लोगों को गिरफ्तार करने की बात स्वीकार की है। लेकिन क्या इतने भर से वह दाग धुल जाएगा जो हमारे कथित सभ्य समाज के दामन पर लगा है? अफसोसनाक यह भी है कि इस घटना को ‘गलत पहचान’ का साधारण मामला बता कर शुरू में रफा-दफा करने तक की कोशिश की गई, पर आॅल अफ्रीकन स्टूडेंट्स यूनियन और तंजानिया उच्चायोग के दखल से इन मंसूबों पर पानी फिर गया। स्त्री-विरोधी अपराधों में कार्रवाई की बाबत ऐसे चलताऊ रवैये के रहते भला कैसे यकीन किया जा सकता है कि इस घटना से हमारी पुलिस या प्रशासन ने भविष्य के लिए कोई सबक लिया होगा।

सड़क हादसों के बाद आक्रोशित भीड़ द्वारा दोषी वाहन चालक से मारपीट, आगजनी, तोड़फोड़ और यातायात जाम करने के मामले अक्सर सामने आते रहे हैं, लेकिन एक सड़क दुर्घटना के बाद निर्दोष विदेशी छात्रा के कपड़े फाड़ कर उसे सड़क पर चलने के लिए मजबूर करने का मामला शायद पहली बार देखा गया है। ‘अतुल्य भारत’ के नारे लगा कर विदेशियों को भारत आने के लिए लुभाने और शैक्षिक-चिकित्सकीय पर्यटन को नई ऊंचाइयों तक ले जाने की राह में ऐसी वारदातें रोड़ा साबित हो सकती हैं।

कुछ लोग अफ्रीकी छात्रों के साथ स्थानीय लोगों के सलूक को रंगभेद के चश्मे से देखने की कोशिश करते रहे हैं जिन्हें हतोत्साहित किए जाने की जरूरत है। दिल्ली के खिड़की एक्सटेंशन में आम आदमी पार्टी की पहली सरकार के कानून मंत्री सोमनाथ भारती द्वारा युगांडा की महिलाओं से कथित दुर्व्यवहार के मामले में भी ऐसी कोशिश की गई थी।

उसके बाद गोवा में एक नाइजीरियाई युवक की हत्या के बाद अफ्रीकी युवाओं द्वारा राजमार्ग अवरुद्ध कर स्थानीय लोगों और पुलिस से उलझने के मामले ने भी काफी तूल पकड़ा था जिसे रंगभेद का रंग देते हुए आरोपों की बौछार हुई थी। असल में ऐसी कुछ घटनाएं अपवाद हैं और इन्हें अफ्रीकी छात्रों या अन्य विदेशियों के प्रति विद्वेष का आधार बनाया या बताया जाना अनुचित है। पर वसुधैव कुटुंबकम की माला जपने और अतिथियों को देव का दर्जा देने वाले देश में ऐसी घटनाएं घोर चिंताजनक हैं, और यह सवाल दरपेश करती हैं कि भारत की बाबत आखिर दुनिया में कैसा संदेश जाएगा!

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