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तंगधार के तार

कश्मीर के तंगधार में सुरक्षा बलों के हाथों तीन आतंकवादियों के मारे जाने से जाहिर है कि आतंकवादी गुटों की सक्रियता कमोबेश बनी हुई है, पर उनसे निपटने के लिए सुरक्षा बल खासे मुस्तैद हैं।

कश्मीर के तंगधार में सुरक्षा बलों के हाथों तीन आतंकवादियों के मारे जाने से जाहिर है कि आतंकवादी गुटों की सक्रियता कमोबेश बनी हुई है, पर उनसे निपटने के लिए सुरक्षा बल खासे मुस्तैद हैं। भारी मात्रा में हथियारों से लैस आतंकवादियों ने कश्मीर के तंगधार में सेना के शिविर पर हमला किया। गुरुवार की सुबह करीब सवा छह बजे उन्होंने गोरखा राइफल्स के शिविर को निशाना बनाते हुए अंधाधुंध गोलीबारी की, जिसके चलते एक आम नागरिक की मौत हो गई और एक जवान घायल हो गया।

मारा गया व्यक्ति शिविर के भीतर जेनरेटर संचालक के तौर पर काम करता था। इस हमले की जिम्मेवारी जिस तरह जैश-ए-मोहम्मद ने ली है उस पर शायद ही किसी को हैरत हुई हो। भारत में लश्कर-ए-तैयबा के बाद जिस आतंकी संगठन ने सबसे ज्यादा कहर बरपाया है वह जैश-ए-मोहम्मद ही है। इन दोनों के तार पाकिस्तान से जुड़े रहे हैं। कुछ ही दिन पहले सुरक्षा बलों को एक और अहम कामयाबी मिली थी, जब उन्होंने लश्कर-ए-तैयबा के कश्मीर के कमांडर अबु कासिम को मार गिराया।

कासिम बरसों से घाटी में सक्रिय था। पिछले पांच साल में जम्मू-कश्मीर में जो भी आतंकी हमले हुए उनमें प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से वह शामिल था। हाल में गुरदासपुर में हुए आतंकी हमले की साजिश भी उसी ने रची थी। जम्मू-कश्मीर की पुलिस ने कासिम के सिर पर दस लाख रुपए का इनाम रखा था; इतनी ही राशि का इनाम राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने भी उसका सुराग देने के लिए घोषित किया हुआ था। कासिम का मारा जाना एक बड़ी उपलब्धि थी, पर ताजा वाकये से जाहिर है कि सीमापार से चलने वाली आतंकवादी गतिविधियां बदस्तूर जारी हैं।

पेरिस पर हुए हमले के बाद से दुनिया भर में आतंकवाद को लेकर बहस चल रही है। हर अंतरराष्ट्रीय मंच से आतंकवाद के खिलाफ एकजुट होकर लड़ने की प्रतिज्ञाओं के स्वर और तेज हो गए हैं। पर सच यह है कि यह सवाल अब भी अनसुलझा है कि कोई देश आतंकवाद के लिए अपनी जमीन का इस्तेमाल होने दे, तो क्या कदम उठाए जाएं। यों जब भी ऐसी घटनाओं के मद्देनजर पाकिस्तान की जवाबदेही का मसला उठा है, पाकिस्तान यह कह कर उसे दरकिनार करने की कोशिश करता है कि ये तत्त्व पाकिस्तान के नुमाइंदे नहीं हैं, इनसे उसका कोई लेना-देना नहीं है। पर क्या इससे पाकिस्तान की जवाबदेही का सवाल खत्म हो जाता है?

गौरतलब है कि कुछ दिन पहले पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति जनरल परवेज मुशर्रफ ने कबूल किया था कि जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद को बढ़ावा देने में उनका हाथ रहा है। इसी तरह पाकिस्तान के दूसरे हुक्मरानों का भी रहा होगा। हकीकत पहले भी छिपी नहीं थी। पर मुशर्रफ ने यह खुलासा अब जाकर क्यों किया? क्या इसलिए कि वे पाकिस्तान की सियासत में एकदम अलग-थलग पड़ चुके हैं और ‘कश्मीर कार्ड’ खेलना चाहते हैं? जो हो, उनकी स्वीकारोक्ति एक बड़ी विडंबना की ओर संकेत करती है। तमाम अंतरराष्ट्रीय मंचों से आतंकवाद के खिलाफ लड़ने के साझा संकल्पों के बावजूद कोई ऐसी व्यवस्था

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