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संपादकीयः गिरावट का सूचकांक

भारतीय शेयर बाजार में भारी गिरावट से व्यवसाय जगत में स्वाभाविक ही चिंता का माहौल है। हालांकि वित्त मंत्रालय निवेशकों को आश्वस्त करने की कोशिश कर रहा है कि भारत में अर्थव्यवस्था अच्छी स्थिति में है, इससे घबराने की जरूरत नहीं है।

Author February 13, 2016 2:36 AM
(Fe PHOTO)

भारतीय शेयर बाजार में भारी गिरावट से व्यवसाय जगत में स्वाभाविक ही चिंता का माहौल है। हालांकि वित्त मंत्रालय निवेशकों को आश्वस्त करने की कोशिश कर रहा है कि भारत में अर्थव्यवस्था अच्छी स्थिति में है, इससे घबराने की जरूरत नहीं है। इस गिरावट को वैश्विक स्थितियों का नतीजा बताया जा रहा है।

अमेरिका, यूरोप और एशिया के प्रमुख शेयर बाजारों में स्थिति खराब है, इसलिए उसका असर भारतीय शेयर बाजार पर भी दिखाई देने लगा है। मगर इसकी वजह सिर्फ यह नहीं है। भारत में भी स्थितियां बाजार के अनुकूल नहीं हैं। यह अकारण नहीं है कि एक तरफ शेयर बाजार ने नीचे का रुख किया है, तो दूसरी तरफ सोने की कीमतें बढ़ रही हैं। दरअसल, कच्चे तेल की कीमतें लगातार उतार पर हैं। जाहिर है, इसकी मांग घटी है। फिर जमीन-जायदाद के कारोबार में मंदी है।

उधर बैंकों की गैरनिष्पादित परिसंपत्तियां यानी एनपीए चिंताजनक स्तर पर पहुंच गई हैं। ऐसे में निवेशकों का भरोसा डिगा है और वे सोने की खरीद की तरफ रुख करते दिख रहे हैं। हालांकि शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव का सीधा असर अर्थव्यवस्था पर नहीं पड़ता, पर इसके चलते उद्योगजगत की सेहत पर प्रभाव जरूर पड़ता है। जिन स्थितियों में शेयर बाजार में गिरावट दर्ज हुई है, वे सरकार के आर्थिक विकास के मंसूबे को कमजोर कर सकती हैं। सोने में निवेश बढ़ने से बाजार में पैसे का प्रवाह बाधित होगा और अर्थव्यवस्था की गति शिथिल पड़ सकती है।
केंद्र सरकार विदेशी निवेश के भरोसे अनेक विकास योजनाओं का सपना साकार करना चाहती है। मगर शेयर बाजार में गिरावट से जाहिर है कि विदेशी निवेशक उन्हें लेकर उत्साहित नहीं हैं।

इस साल घरेलू बाजार से विदेशी निवेशकों ने तेरह हजार करोड़ रुपए की निकासी की है। इसके चलते उभरते उद्योगों को खासा दबाव महसूस करना पड़ रहा है। करीब इक्कीस महीने पहले जब इसी तरह शेयर बाजार ने नीचे का रुख किया था तब सरकार को सोने के आयात-निर्यात संबंधी नियमों को सख्त बनाना पड़ा था। फिलहाल सरकार को लग रहा है कि स्थितियां जल्दी सुधर जाएंगी, इसलिए वह कोई कड़ा कदम उठाने से बच रही है। मगर बजट पेश होने तक इसमें सुधार की कोई सूरत नजर नहीं आती। नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद शेयर बाजार में सबसे अधिक उछाल देखा गया था। निवेशकों में उम्मीद बनी थी कि उद्योग-धंधों में बेहतरी का माहौल बनेगा। प्रधानमंत्री ने इसके लिए प्रयास भी काफी किया।

निवेश संबंधी नियमों को लचीला बनाने से लेकर श्रम कानूनों तक में सुधार का प्रयास किया। फिर भी अगर विदेशी निवेशक आकर्षित नहीं हो रहे तो यह चिंता का विषय होना चाहिए। रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन ने सरकारी बैंकों के बढ़ते घाटे को लेकर चिंता जताई है। उनका कहना है कि इसके लिए गंभीर प्रयासों की जरूरत है। बैंक घाटे की बड़ी वजह बड़े उद्योगों को दिए गए कर्जों की वसूली न हो पाना है। इसके खिलाफ कड़े कदम उठाने की जरूरत लंबे समय से रेखांकित की जाती रही है, पर सरकारें उनसे कर्ज वसूली के बजाय करों में छूट का रास्ता अख्तियार करती रही हैं। अगर मोदी सरकार ने समय रहते इस दिशा में साहसिक कदम नहीं उठाया तो न सिर्फ सरकारी बैंकों की सेहत सुधारना कठिन होगा, बल्कि विकास योजनाओं को गति प्रदान करना और अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाना भी चुनौती साबित होगा।

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