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राजनीतिः आर्थिक सुधारों का असर

कच्चे तेल की कीमत का कारोबार पर पड़ने वाला प्रभाव पहले से कम हुआ है, जिसका कारण प्रौद्योगिकी का प्रसार और ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों में इजाफा होना हो सकता है। भारत में पिछले चार वर्षों में ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों में 1.4 गुना की वृद्धि हुई है। साथ ही, कुशल श्रम की प्रचुरता भी मुद्रास्फीति को कम करने में सहायक हुई है। आश्वस्त करते आंकड़ों के बावजूद अर्थव्यवस्था के समक्ष मौजूद चुनौतियों को सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता।

Author April 28, 2018 3:18 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष (आइएमएफ) के अनुसार, भारत में आर्थिक सुधारों का सकारात्मक परिणाम दिखने लगा है। आइएमएफ के उप प्रबंध निदेशक (प्रथम) डेविड लिप्टन के मुताबिक, कई मुश्किलों के बाद भी वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) को अमली जामा पहनाने से प्रणाली को पारदर्शी बनाने और कर-चोरी को रोकने में मदद मिलेगी; अभी भारत को बहुत सारे कार्य करने हैं, लेकिन उसने अब तक जो कदम उठाए हैं उनका फायदा दिखने लगा है।

जीडीपी के ताजा आंकड़े अर्थव्यवस्था को लेकर आश्वस्त करते हैं। केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक अक्तूबर से दिसंबर, 2017 की तिमाही में जीडीपी वृद्धि दर बढ़ कर 7.2 प्रतिशत पहुंच गई, जो वित्तवर्ष 17-18 की दूसरी तिमाही में 6.5 फीसद थी। यह वृद्धि पिछली पांच तिमाहियों में सबसे अधिक है। यही नहीं, ताजा आंकड़ों के साथ भारत ने जीडीपी की वृद्धि दर के मामले में चीन को भी पीछे छोड़ दिया है।

उम्मीद के मुताबिक वित्तवर्ष 18 की तीसरी तिमाही में जीवीए 6.7 फीसद रही, जो दूसरी तिमाही में 6.2 फीसद थी। इसका कारण विनिर्माण क्षेत्र में 8.1 फीसद की वृद्धि और व्यापार, होटल, परिवहन, संचार उप क्षेत्रों में 9.0 फीसद की वृद्धि होना है। विगत दो तिमाहियों में जीवीए में वृद्धि कम जीवीए डिफ्लेटर के कारण हुई थी, लेकिन वित्तवर्ष 18 की तीसरी तिमाही में जीडीपी और जीवीए डिफ्लेटर दोनों में बढ़ोतरी हुई है, जो अर्थव्यवस्था में सुधार का संकेत है।

उद्योग क्षेत्र में वित्तवर्ष 18 की तीसरी तिमाही में 6.8 फीसद की दर से वृद्धि हुई, जो दूसरी तिमाही में 5.9 फीसद की दर से वृद्धि हुई थी, जिसका कारण विनिर्माण जीवीए में 8.1 फीसद की दर से वृद्धि होना है। कॉरपोरेट जीवीए में भी 11.3 फीसद की दर से वृद्धि हुई है। वित्तवर्ष की तीसरी तिमाही के दौरान खनन और उत्खनन क्षेत्र में (0.1%) की दर से नकारात्मक वृद्धि होने का मूल कारण आधार वर्ष में बदलाव है। निर्माण क्षेत्र में तीसरी तिमाही में 6.8 फीसद की दर से बढ़ोतरी हुई, जबकि पहली तिमाही में इसमें 5.2 फीसद की दर से वृद्धि हुई थी।

वित्तवर्ष 18 में सेवा क्षेत्र में वृद्धि दर 8.3 फीसद रही, जो वित्तवर्ष 17 के 7.5 फीसद से बेहतर है, जिसका कारण व्यापार, होटल, परिवहन, संचार और सेवा क्षेत्र में 8.3 फीसद, वित्तीय, रीयल एस्टेट और व्यावसायिक सेवा में 7.2 फीसद आदि की दर से वृद्धि होना है। व्यय के संदर्भ में जीएफसीएफ में वित्तवर्ष 18 की तीसरी तिमाही में 12.0 फीसद की वर्ष-दर-वर्ष वृद्धि दर्ज की गई, जबकि पिछली तिमाही में इसमें 6.9 फीसद की दर से वृद्धि दर्ज की गई थी। मौजूदा कीमतों पर जीएफसीएफ में 9.7 फीसद की दर से वृद्धि होने की उम्मीद है, जबकि स्थिर मूल्य पर इसमें 7.6 फीसद की दर से वृद्धि होने की संभावना है। पूंजीगत क्षेत्र में गिरावट के कारण समग्र निवेश में कमी आने की बात कहना पूरी तरह से सही नहीं हो सकता है। पिछले साल के आंकड़े बताते हैं कि वित्तवर्ष 17 के दौरान जीएफसीएफ में निजी गैर-वित्तीय कॉरपोरेट क्षेत्र का हिस्सा बढ़ कर 42.2 फीसद हो गया, जबकि वित्तवर्ष 15 में यह 35.9 फीसद और वित्तवर्ष 16 में 41.1 फीसद रहा।

मार्च महीने में सीपीआई मुद्रास्फीति घट कर 4.24 फीसद हो गई, जो फरवरी में 4.44 फीसद थी। मार्च में खाद्य व पेय पदार्थों और र्इंधन की कीमतों में क्रमश: 3.01 फीसद और 5.73 फीसद की गिरावट दर्ज की गई, जो फरवरी में क्रमश: 3.46 फीसद और 6.88 फीसद थी। इस बीच फरवरी 18 का संशोधित कोर सीपीआई जो 5.16% था, मार्च में बढ़ कर 5.37 फीसद हो गया है, जिसका कारण शिक्षा और अन्य सेवाओं के घटकों में बढ़ोतरी होना है। शिक्षा के क्षेत्र में बढ़ोतरी का कारण ट्यूशन शुल्क में इजाफा होना है। मार्च महीने में ग्रामीण मुद्रास्फीति 4.44 फीसद रही, जो शहरी मुद्रास्फीति 4.12 फीसद से ज्यादा है।

कच्चे तेल की कीमत जून 17 के 46 डॉलर प्रति बैरल से बढ़ कर जनवरी 18 में 67 डॉलर प्रति बैरल हो गई। बाद में इसमें गिरावट आई, लेकिन 60 से 67 डॉलर प्रति बैरल की सीमा में इसमें उतार-चढ़ाव आता रहा। पेट्रोलियम निर्यात करने वाले देशों के संगठन (ओपेक) ने वर्ष 2018 के अंत तक उत्पादन में कटौती बढ़ाने का निर्णय लिया है। बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए मौजूदा तेल भंडार का उपयोग करने की योजना है। इसकी कुछ हद तक पूर्ति अमेरिका में हो रहे कच्चे तेल उत्पादन से की जाएगी। इस आधार पर कहा जा सकता है कि इस साल कच्चे तेल की औसत कीमत लगभग 65 डॉलर प्रति बैरल होगी। बाजार में आशंका है कि तेल की कीमतों में निरंतर वृद्धि से मुद्रास्फीति, राजकोषीय घाटे और चालू खाते के घाटे पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।

रिजर्व बैंक द्वारा वर्ष 2012 में किए गए एक अध्ययन के अनुसार घरेलू कीमतों के कैलिब्रेटेड और चरणबद्ध समायोजन की रणनीति मुद्रास्फीति को बढ़ाने और विकास को अस्थिर करने के बजाय मुद्रास्फीति की संभावनाओं को स्थिर करने में उपयोगी होती है। अंतरराष्ट्रीय अनुभव भी यह बताता है कि तेल की कीमतों को अचानक से विनियंत्रित करने से मुद्रास्फीति में तेज बढ़ोतरी हो सकती है, जैसा कि इंडोनेशिया में कुछ समय पहले हुआ था।

भारत में पेट्रोलियम की कीमतों को चरणबद्ध तरीके से विनियंत्रित किया गया है और कीमतें दैनिक आधार पर समायोजित की जा रही हैं। इसलिए यहां अचानक से र्इंधन की कीमत में उल्लेखनीय वृद्धि नहीं हुई है। यदि हम कच्चे तेल के संदर्भ में सीपीआई का अध्ययन करते हैं तो जून 17 से मार्च 18 की अवधि में कच्चे तेल की कीमतें जून 17 से बढ़ने लगीं। कच्चे तेल की औसत कीमत में बढ़ोतरी 17 डॉलर प्रति बैरल की हुई, जिसका प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष प्रभाव लगभग 13 आधार अंकों का रहा। कच्चे तेल की कीमत में 10 डॉलर प्रति बैरल की वृद्धि होने पर सीपीआई में 10 आधार अंकों की बढ़ोतरी होती है।

अगर कच्चे तेल की कीमत में वृद्धि जारी रहती है तो सरकार को उत्पाद शुल्क में कटौती करनी पड़ सकती है। पेट्रोल और डीजल पर शुल्क आरोपित करने जैसे पिछले रुझानों से पता चलता है कि कच्चे तेल के मूल्य में प्रति बैरल दस डॉलर की बढ़ोतरी होने पर उत्पाद शुल्क में एक रुपए कटौती हो सकती है। गणना से पता चलता है कि इस तरह की कटौती से सरकारी राजस्व 11905 करोड़ रुपए सालाना कम हो सकता है, जिससे राजकोषीय घाटे में 0.06 फीसद की वृद्धि होगी।

कच्चे तेल की कीमत का कारोबार पर पड़ने वाला प्रभाव पहले से कम हुआ है, जिसका कारण प्रौद्योगिकी का प्रसार और ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों में इजाफा होना हो सकता है। भारत में पिछले चार वर्षों में ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों में 1.4 गुना की वृद्धि हुई है। साथ ही, कुशल श्रम की प्रचुरता भी मुद्रास्फीति को कम करने में सहायक हुई है। कुशल मजदूरों में बढ़ोतरी से मजदूरों को वाजिब मजदूरी नहीं मिल पा रही है, जिससे वैश्विक स्तर पर मुद्रास्फीति में गिरावट आ रही है। मजदूरी में कम वृद्धि के कारण उपभोक्ता कम खर्च कर पा रहे हैं, जिससे कमजोर मुद्रास्फीति की गतिशीलता बढ़ गई है। भारत में सूचीबद्ध कंपनियों के मजदूरी बिल में वित्तवर्ष 18 में महज 2.9 फीसद बढ़ोतरी होने का अनुमान है। आश्वस्त करते आंकड़ों के बावजूद अर्थव्यवस्था के समक्ष मौजूद चुनौतियों को सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता। फिलवक्त, बैंकों में फर्जीवाड़े की घटनाओं पर काबू पाना और एनपीए की वसूली करना सरकार और बैंकों, दोनों के लिए एक बड़ी चुनौती है।

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