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संपादकीयः बेतुका बयान

लखनऊ में एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने कहा कि कहीं ऐसा न हो कि लोग अपने बच्चों के दो साल का होते ही सरकार के भरोसे छोड़ दें और सरकार उनका पालन-पोषण करे!
Author September 1, 2017 02:07 am
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ

इससे बड़ी विडंबना क्या होगी कि गोरखपुर के बीआरडी अस्पताल में बच्चों की लगातार मौत की खबरों के मद्देनजर जहां उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को हालात पर नियंत्रण करना चाहिए, वहां वे अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने के लिए संवेदनहीन बयान दे रहे हैं। लखनऊ में एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने कहा कि कहीं ऐसा न हो कि लोग अपने बच्चों के दो साल का होते ही सरकार के भरोसे छोड़ दें और सरकार उनका पालन-पोषण करे! इससे पहले उनके स्वास्थ्य मंत्री सिद्धार्थनाथ सिंह ने कहा था कि अगस्त में तो बच्चे मरते ही हैं। सवाल है कि आखिर योगीजी को इस तरह का बेतुका बयान देने की जरूरत क्यों पड़ी? राज्य सरकार का नेतृत्व संभालने के नाते उनकी जिम्मेदारी यह भी है कि वे नागरिकों के सुख-दुख के संदर्भों को समझें और जरूरत के मुताबिक उचित कदम उठाएं। लेकिन सरकार के दायित्व को पूरा करने के बरक्स अगर वे लोगों की तकलीफों पर तंज कसते हैं तो इस पर सवाल उठना लाजिमी है।

गौरतलब है कि बीआरडी अस्पताल में पिछले एक महीने के दौरान करीब तीन सौ बच्चों की मौत हो चुकी है। इन मौतों में जितनी भूमिका इंसेफ्लाइटिस या दूसरी बीमारियों की है, उससे कहीं ज्यादा अव्यवस्था और इलाज में हो रही लापरवाही की है। पिछले महीने की दस और ग्यारह तारीख को जब उस अस्पताल में आॅक्सीजन की आपूर्ति रोक दिए जाने के चलते एक साथ छत्तीस बच्चों की मौत हो गई तो देश भर में इस मसले पर आक्रोश फैला। अस्पताल प्रशासन से लेकर सरकार तक कठघरे में हैं। लेकिन कार्रवाई के नाम पर कुछ निलंबन के बाद मान लिया गया कि समस्या का हल हो गया। जबकि उसके बाद अब भी वहां बच्चों के मरने की खबरें आ रही हैं। एक दिन पहले की खबर के मुताबिक बीते बहत्तर घंटों के दौरान तिरसठ बच्चों की मौत हो गई। सवाल है कि आखिर वे कौन-सी वजहें हैं कि देश भर में चिंता जाहिर किए जाने के बावजूद एक अस्पताल में इलाज की वैसी व्यवस्था नहीं की जा सकी है कि वहां बच्चों की मौत के सिलसिले को रोका जा सके। आखिर यह किसकी जिम्मेदारी है? नागरिकों को उनकी सामान्य जिम्मेदारियों की याद दिलाना गलत नहीं है। लेकिन अगर उन्हें यह अहसास दिलाते हुए अपनी जिम्मेदारी पर परदा डालने की कोशिश हो तो इसे कैसे देखा जाएगा!

योगी का कहना है कि लोगों की आदत होती है कि वे हर काम के लिए सरकार के भरोसे होते हैं। देश और राज्य के नागरिक के रूप में लोगों के जो अधिकार हैं, अगर वे उनके मुताबिक अपेक्षा या मांग करते हैं तो इसमें कुछ भी गलत नहीं है। मसलन, अपने बच्चे के बीमार पड़ने के बाद किसी सरकारी अस्पताल में अच्छा इलाज हासिल करना नागरिकों का हक भी है। बाल कल्याण से संबंधित तमाम कार्यक्रम और योजनाएं यह बताने के लिए काफी हैं कि छोटे बच्चों की सेहत और शिक्षा का खयाल रखने के लिए सरकार के कुछ दायित्व तय हैं। बल्कि गरीब तबकों के बच्चों को उचित पोषण मिल सके, इसके लिए एकीकृत बाल विकास योजना जैसे कई कार्यक्रम हैं। लेकिन अगर बाल कल्याण से संबंधित कार्यक्रमों या योजनाओं पर ठीक से अमल नहीं हो पाता है तो इसके लिए सरकार की ही जवाबदेही बनती है। लेकिन इस जिम्मेदारी को याद रखते हुए संवेदना के दो बोल बोलने के बजाय सामान्य नागरिकों पर ही सवाल उठना कितना उचित है!

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