यह छिपी बात नहीं है कि जितने बड़े इलाके में अरावली की पहाड़ियां फैली हैं, वहां और उसके आसपास उसकी क्या अहमियत है। इसे सिर्फ इतने से समझा जा सकता है कि समूची पर्वत-शृंखला को एक जीवन-रेखा की तरह देखा जाता है।

विडंबना यह है कि वहां खनन और अन्य गतिविधियों की वजह से पूरे क्षेत्र में पड़ने वाले प्रभाव और उसके नुकसानों को देखते हुए जब अरावली के संरक्षण के लिए स्वर तेज हो रहे हैं, वैसे में भी सरकार को नई परियोजनाओं के असर पर विचार करना जरूरी नहीं लग रहा है।

गौरतलब है कि हरियाणा सरकार सुप्रीम कोर्ट में गुरुग्राम और नूंह जिले में प्रस्तावित जंगल सफारी पर विस्तृत योजना जमा करना चाहती थी। हरियाणा सरकार की ओर से अदालत में यह दलील भी दी गई कि सफारी परियोजना की विस्तृत रपट में जरूरत की भूमि को दस हजार एकड़ से बदल कर तीन हजार तीन सौ एकड़ कर दिया गया है।

मगर शीर्ष अदालत ने इस पर सख्त रुख अख्तियार किया और कहा कि जब तक विशेषज्ञ अरावली क्षेत्र की परिभाषा को बिल्कुल स्पष्ट नहीं कर देते, तब तक किसी को भी अरावली को छूने नहीं दिया जाएगा और कोई भी विकास या निर्माण कार्य की अनुमति नहीं दी जाएगी।

गौरतलब है कि पिछले वर्ष अक्तूबर में हरियाणा सरकार की प्रस्तावित ‘अरावली जू सफारी’ परियोजना पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी थी। हालांकि सरकार का कहना था कि इस परियोजना के तहत विश्व की सबसे बड़ी सफारी तैयार की जाएगी, जिसमें बाघ, पक्षी, सरीसृप और तितलियों के लिए अलग-अलग क्षेत्र बनाए जाने थे।

मगर भारतीय वन सेवा के पांच सेवानिवृत्त अधिकारियों और एक संगठन की ओर से दायर याचिका में कहा गया कि पहले ही संकट का सामना कर रही अरावली पर्वत-शृंखला के लिए यह परियोजना विनाशकारी साबित होगी। यह समझना मुश्किल है कि ‘जू सफारी’ बनाने या ऐसी अतिरिक्त गतिविधियों को जहां समूचे अरावली क्षेत्र के लिए नुकसानदेह माना जा रहा है, पर्यावरणविद् इसके लिए चेताते रहे हैं, उस इलाके में अरावली के परिभाषित होने तक रुकना क्यों जरूरी नहीं समझा जा रहा है।

जिस पहलू को सरकार को खुद समझना चाहिए, उसके लिए शीर्ष अदालत को बताने की जरूरत क्यों पड़ रही है। दरअसल, इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने पिछले वर्ष नवंबर में अरावली पहाड़ियों और पर्वतमाला की एक जैसी परिभाषा को स्वीकार कर लिया था। हालांकि बाद में विशेषज्ञों की रपट आने तक दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात में फैले इसके इलाकों में खनन के नए पट्टे देने पर रोक लगा दी थी।

चार राज्यों और कई सौ किलोमीटर के क्षेत्र में फैली अरावली दुनिया की सबसे पुरानी पर्वत शृंखलाओं में एक है और यह थार मरुस्थल को पूर्व यानी दिल्ली सहित राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में फैलने से रोकने वाली एक प्राकृतिक ढाल के रूप में काम करती है। इसे समूचे उत्तर-पश्चिम भारत के लिए एक बेहद अहम पारिस्थिति तंत्र के रूप में देखा जाता है और भूजल के पुनर्भरण, मानसून को प्रभावित करने तथा जैव विविधता के संरक्षण में इसकी महत्त्वपूर्ण भूमिका है।

ऐसे में अरावली की पहाड़ियों के जीवन-तत्त्व की अनदेखी कर अगर खनन या फिर किसी भी तरह की परियोजना पर काम किया जाता है, तो उसका व्यापक असर पड़ेगा। बेहतर हो कि किसी भी तरह की गतिविधि से पहले हर हाल में यह सुनिश्चित किया जाए कि अरावली के अस्तित्व को कोई भी नुकसान न पहुंचे। ‘प्राकृतिक संसाधनों की लूट हो रही…’, अरावली में अवैध खनन पर पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट सख्त