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संपादकीय: भुखमरी के सामने

इसमें कोई संदेह नहीं कि इस वक्त दुनिया के समक्ष अभूतपूर्व मानवीय संकट खड़े हो गए हैं। जब तक कोरोना का टीका या दवा नहीं आ जाती, तब तक सरकारों का सारा ध्यान इसके प्रसार को रोकने पर लगा रहेगा। ऐसे में भुखमरी जैसी समस्याओं से निपटना प्राथमिकता में होगा, कह पाना मुश्किल है। इस वजह से संयुक्त राष्ट्र के राहत कार्यक्रमों को भारी धक्का लगेगा।

Deathभूख से जद्दाेजहद करते बच्‍चे। फाइल फोटो।

दुनिया में भुखमरी बढ़ने को लेकर जो आशंकाएं व्यक्त की जा रही हैं, वे चिंता पैदा करने वाली हैं। जिस तेजी से हालात बिगड़ रहे हैं, उसमें अगर सरकारों और संयुक्त राष्ट्र जैसे अंतरराष्ट्रीय निकायों ने इस समस्या से निपटने को लेकर गंभीर रुख नहीं दिखाया और समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए तो आगामी वर्षों में स्थिति को विस्फोटक रूप धारण करने से कोई नहीं रोक पाएगा। संयुक्त राष्ट्र के मानवीय मामलों के विभाग ने हाल में अपनी रिपोर्ट में चेतावनी दी है कि अगले एक साल में भुखमरी के शिकार लोगों का आंकड़ा दो गुना हो सकता है।

इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि दुनिया के देशों में भुखमरी से कैसे विकट हालात पैदा हो रहे हैं। यों पहले से ही बड़ी संख्या में गरीब और विकासशील देश भुखमरी की समस्या से जूझ रहे हैं, लेकिन इस साल पूरी दुनिया में कोरोना महामारी ने हालात और बिगाड़ दिए हैं। स्थिति इसलिए भी संकटपूर्ण हो गई है, क्योंकि कोरोना महामारी से निपटने के प्रयासों ने सरकारों की माली हालत बिगाड़ कर रख दी है। इस वक्त दुनिया के ज्यादातर देश, चाहे विकसित देश हों या विकासशील और गरीब राष्ट्र, सब की अर्थव्यवस्था चौपट हुई पड़ी है। ऐसे में सरकारों के समक्ष बड़ी चुनौती कोरोना से निपटने के साथ-साथ भुखमरी से लड़ने की भी है।

इसमें कोई संदेह नहीं कि इस वक्त दुनिया के समक्ष अभूतपूर्व मानवीय संकट खड़े हो गए हैं। जब तक कोरोना का टीका या दवा नहीं आ जाती, तब तक सरकारों का सारा ध्यान इसके प्रसार को रोकने पर लगा रहेगा। ऐसे में भुखमरी जैसी समस्याओं से निपटना प्राथमिकता में होगा, कह पाना मुश्किल है। इस वजह से संयुक्त राष्ट्र के राहत कार्यक्रमों को भारी धक्का लगेगा।

स्थिति इसलिए ज्यादा बिगड़ी हुई है कि राहत अभियानों और कार्यक्रमों के लिएो संयुक्त राष्ट्र में यूरोप के संपन्न देश, अमेरिका, रूस, चीन जैसे तमाम देश अपना योगदान करते आए हैं। लेकिन अब इन देशों की अर्थव्यवस्था भी चरमरा गई है। जाहिर है, वे पहले अपनी अर्थव्यवस्था सुधारेंगे, तब योगदान की सोचेंगे। मानवीय मामलों को देखने वाले संयुक्त राष्ट्र के कार्यालय का अनुमान बता रहा है कि अगले साल उसे भुखमरी और अन्य संकटों से जूझ रहे सोलह करोड़ लोगों को राहत पहुंचाने के लिए पैंतीस अरब डॉलर की जरूरत पड़ेगी। जबकि इस साल उसे सिर्फ सत्रह अरब डॉलर ही मिले हैं। ऐसे में भुखमरी दूर करने, चिकित्सा सहायता पहुंचाने जैसे अभियान कैसे चलेंगे, यह बड़ा सवाल खड़ा है।

संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुतारेस पहले ही चेता चुके हैं कि कोरोना महामारी की मार से दुनिया में पांच करोड़ लोग और बेहद गरीबी में चले जाएंगे। जाहिर है, इससे भुखमरी और फैलेगी, लाखों बच्चे कुपोषण का शिकार हो जाएंगे। दुनिया में अभी करीब बयासी करोड़ लोग भुखमरी का शिकार हैं और पांच साल से कम उम्र के चौदह करोड़ बच्चे ऐसे हैं जो कुपोषण की वजह से शारीरिक विकास संबंधी समस्याएं झेल रहे हैं।

ऐसे में सरकारों के सामने बड़ा संकट महामारी के साथ-साथ भुखमरी जैसी समस्या से निपटने का भी है। अगर सरकारें ठोस नीतियां बनाएं और उन पर सुनियोजित तरीके से अमल करें तो ऐसे संकटों से भी पार पाया जा सकता है। इसके लिए बस राजनीतिक इच्छाशक्ति चाहिए, जिसका कि निंतात अभाव देखने में आता है, खासतौर से विकासशील और गरीब देशों में। इस वक्त भुखमरी का सबसे ज्यादा संकट यमन, सीरिया, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, वेनेजुएला, सूडान, नाइजीरिया, कांगो, हैती और यूक्रेन जैसे देशों के समक्ष है। लेकिन इन देशों में जिस तरह के राजनीतिक हालात हैं, उनमें सरकारें कैसे भुखमरी से निपटेंगी, कोई नहीं जानता।

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