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कलाम का कद

एपीजे अब्दुल कलाम वैज्ञानिक थे, मगर व्यवहार में शिक्षक का आचरण और भिक्षुक की सादगी थी। उन्होंने राष्ट्रपति पद की गरिमा को एक नई भंगिमा दी। जुलाई 2002 में देश के ग्यारहवें राष्ट्रपति चुने जाने से पहले उनकी ख्याति एक वैज्ञानिक की थी।

Author July 29, 2015 09:03 am
एपीजे अब्दुल कलाम वैज्ञानिक थे, मगर व्यवहार में शिक्षक का आचरण और भिक्षुक की सादगी थी। उन्होंने राष्ट्रपति पद की गरिमा को एक नई भंगिमा दी।

एपीजे अब्दुल कलाम वैज्ञानिक थे, मगर व्यवहार में शिक्षक का आचरण और भिक्षुक की सादगी थी। उन्होंने राष्ट्रपति पद की गरिमा को एक नई भंगिमा दी। जुलाई 2002 में देश के ग्यारहवें राष्ट्रपति चुने जाने से पहले उनकी ख्याति एक वैज्ञानिक की थी। वे मिसाइलमैन कहे जाते थे। भारत को अंतरिक्ष में पहुंचाने और मिसाइल क्षमता से लैस करने में उनका बहुत महत्त्वपूर्ण योगदान था।

अपनी वैज्ञानिक उपलब्धियों के लिए देश के सर्वोच्च नागरिक अलंकरण ‘भारत रत्न’ से नवाजे गए कलाम ने वर्ष 1998 के पोकरण परमाणु परीक्षण में अहम भूमिका निभाई थी। वे वाजपेयी सरकार के मुख्य वैज्ञानिक सलाहकार रहे। उनका राष्ट्रपति चुना जाना इस बात का प्रतीक था कि कोई गैर-राजनीतिक पृष्ठभूमि का व्यक्ति भी राष्ट्र का प्रमुख हो सकता है। इसके साथ तत्कालीन वाजपेयी सरकार द्वारा उनके चयन के पीछे राजनीतिक पहलू शायद यह भी था कि गुजरात नरसंहार के बाद सौहार्द की राजनीति की स्थापना वक्त का अहम तकाजा थी। अकारण नहीं था कि पद ग्रहण करने के बाद कलाम ने सांप्रदायिकता की आग में दहकते गुजरात का दौरा किया, हालांकि सरकार इस दौरे के शायद हक में नहीं थी।

भारत में राष्ट्रपति का पद अमूमन शोभा का पद माना जाता है। अन्य राष्ट्रपतियों की तरह कलाम ने इसका निर्वाह भी किया। लेकिन ऐसा भी अवसर आया जब सरकार को उसकी भूल का अहसास कराने से नहीं हिचके। मसलन, 2006 में उन्होंने लाभ के पद से संबंधित विधेयक, स्पष्टता की कमी रेखांकित कर, पुनर्विचार के लिए लौटा दिया था। इस पर उन्होंने तभी हस्ताक्षर किए जब विधेयक उनके पास दुबारा भेजा गया। कलाम ने न तो राष्ट्रपति भवन के तामझाम को अपने ऊपर हावी होने दिया न लोगों से दूरी बनाई।

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बल्कि उन्होंने राष्ट्रपति भवन के दरवाजे आम लोगों के लिए खोलने की पहल की और हमेशा लोगों से संपर्क और संवाद बनाए रखा। यही वजह है कि वे जनता के राष्ट्रपति कहे गए। खासकर युवाओं से बातचीत में उन्होंने विशेष रस आता था। उनके बीच वे सहजता से घुलमिल जाते, उनके प्रश्नों के उत्तर देते, उनकी जिज्ञासाएं शांत करते। अवाम में कलाम ने हमेशा अपने को एक शिक्षक के रूप में पेश किया। वे कहते थे, मैं शिक्षक ही रहना चाहता हूं। जाऊं तो भी शिक्षक के रूप में। वही हुआ। करीब चौरासी साल की उम्र में दिल का दौरा पड़ने से जब वे सदा के लिए विदा हुए, शिलांग के राजीव गांधी भारतीय प्रबंध संस्थान में व्याख्यान दे रहे थे। व्याख्यान के दौरान ही उनके दिल ने धड़कना बंद कर दिया।

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वैज्ञानिक और राष्ट्रपति के बाद एक शिक्षक के रूप में देश के लोगों से संवाद उनकी शख्सियत का तीसरा आयाम था। सदा सकारात्मक ढंग से सोचने और ज्ञान के पीछे भागने की सीख देने वाले कलाम नाकामी को सीखने की पहली सीढ़ी कहते थे। वे ज्ञान आधारित समाज का सपना देखते थे। उनका दृष्टिकोण समाधान-केंद्रित था।

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उनके नजरिए ने, जिसकी विस्तृत झलक उनकी आत्मकथा ‘अग्नि की उड़ान’ में मिलती है, बहुत-से लोगों खासकर युवाओं को प्रभावित किया। कलाम की एक बड़ी खूबी यह भी थी कि उनमेंभारत की समन्वय की परंपरा अभिव्यक्त होती थी। वे कुरान और गीता, दोनों के उद्धरण दे सकते थे। वैज्ञानिक कलाम वीणा भी बजाते थे और उनमें एक गहरा आध्यात्मिक रुझान था। अपने कर्म और मर्म में हमेशा उन्होंने यही जताया कि शीर्ष पद पर होने का संवैधानिक ही नहीं, नैतिक अर्थ भी होता है। यह संदेश ओझल नहीं होना चाहिए।

 

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