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संपादकीय: भुखमरी के खिलाफ

भारत भी दुनिया के उन देशों में शुमार है जो भुखमरी की समस्या से अभी तक निजात नहीं पा सके हैं। वैश्विक भुखमरी सूचकांक में भारत की स्थिति हालात की गंभीरता को बताने के लिए काफी है।

इटली की राजधानी रोम स्थित विश्व खाद्य कार्यक्रम (World Food Programme) का मुख्यालय।

विश्व खाद्य कार्यक्रम (डब्ल्यूएफपी) को इस साल का नोबेल शांति पुरस्कार देने की घोषणा कर नोबेल समिति ने इस वैश्विक कार्यक्रम की प्रासंगिकता और इसके महत्त्व को और बढ़ा दिया है। डब्ल्यूएफपी को यह सम्मान इस बात का संदेश है कि दुनिया में गरीबी और भुखमरी के खात्मे के लिए अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। समस्या की गंभीरता और जटिलता को देखते हुए हालांकि यह कोई आसान नहीं है, लेकिन असंभव भी नहीं है।

दुनिया के अमीर राष्ट्र मिल कर ठान लें तो आने वाले दशकों में मानवता को कलंकित करने वाली इन समस्याओं से काफी हद तक छुटकारा पाया जा सकता है। पिछले छह दशकों में विश्व खाद्य कार्यक्रम के जरिए दुनियाभर में करोड़ों लोगों की जान बचाई गई है, खासतौर से उन देशों और इलाकों में जो युद्ध, जातीय व राजनीतिक संघर्ष की आग में झुलसते रहे हैं और इन मुल्कों के लाखों लोग दाने-दाने को मोहताज हुए हैं। ज्यादातर गरीब देशों की दास्तां यही है, विशेषरूप से अफ्रीका के देशों में।

ऐसे में विश्व खाद्य कार्यक्रम की भूमिका काफी महत्त्वपूर्ण हो जाती है। इसलिए नोबेल शांति पुरस्कार की घोषणा के तत्काल के बाद डब्ल्यूएफपी के प्रमुख डेविड बेस्ली ने कहा कि यह पुरस्कार दुनिया को इस बात का संदेश दे रहा है कि वह भुखमरी के शिकार लोगों को कभी न भूले।

अभी भी दुनिया में तमाम देश हैं जहां भूख से मौतें सामान्य बात है, लेकिन सरकारों के उपेक्षापूर्ण रवैए के कारण ऐसी समस्याएं गौण हो जाती हैं। इनमें गरीब और विकासशील देश दोनों ही शामिल हैं। एक मोटे अनुमान के मुताबिक अभी भी दुनिया का हर नौवां व्यक्ति भुखमरी का शिकार है।

यह स्थिति चिंता और शर्म से भर देने वाली है। एक ओर हम फोर्ब्स में अमीरों की सूची देखते हैं, दुनिया के अमीर देश शिखर सम्मेलनों में गरीबी से निपटने की लंबी-चौड़ी बातें और दावे करते हैं, हर साल स्विटजरलैंड के शहर दावोस में अमीरों का जमावड़ा होता है और दुनिया को बड़े-बड़े सपने दिखाए जाते हैं, लेकिन गरीबी और भुखमरी को खत्म करने की दिशा में ऐसे ठोस कदम उठते नहीं नजर आते, जिनसे लाखों लोगों को सिर्फ भूख के कारण मरने से बचाया जा सके।

भारत भी दुनिया के उन देशों में शुमार है जो भुखमरी की समस्या से अभी तक निजात नहीं पा सके हैं। वैश्विक भुखमरी सूचकांक में भारत की स्थिति हालात की गंभीरता को बताने के लिए काफी है। हालांकि पिछले छह दशकों से डब्ल्यूएफपी ने भारत में काफी काम किया है और लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली व स्कूली बच्चों को मध्याह्न भोजन जैसी योजनाओं को कामयाब बनाने में मदद दी है।

ग्रामीण इलाकों में कुपोषण की समस्या से निपटने में भी डब्ल्यूएफपी मदद दे रहा है। विश्व खाद्य कार्यक्रम ने 2030 तक दुनिया से भुखमरी खत्म करने का संकल्प किया है। इस संस्था के सामने चुनौतियां कम नहीं हैं।

इस साल कोरोना महामारी ने दुनिया के अच्छे-अच्छे देशों की कमर तोड़ कर रख दी है। ऐसे में संकट यह खड़ा हो गया है कि जो अमीर देश संयुक्त राष्ट्र की संस्थाओं और कार्यक्रमों को आर्थिक मदद देते थे, उन्होंने भी हाथ खड़े कर दिए। जबकि डब्लयूएफपी ने इस साल करीब चौदह करोड़ लोगों तक पहुंचने का लक्ष्य रखा है। इसीलिए डब्लयूएफपी प्रमुख ने दुनियाभर के दो हजार से अधिक अरबपतियों से भी मदद मांगी है। जाहिर है, अमीरों की मेहरबानी होगी तो गरीबों का उद्धार होगा।

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