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भाजपा की कमान

अमित शाह को एक बार फिर आम सहमति से अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी सौंप कर भारतीय जनता पार्टी ने उनके प्रति अपना भरोसा कायम रखा है।

नई दिल्ली | January 25, 2016 2:32 AM
प्रधानमंत्री ने अमित शाह को बधाई दी और विश्वास जताया कि पार्टी उनके नेतृत्व में नई ऊंचाइयों को छुएगी।

अमित शाह को एक बार फिर आम सहमति से अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी सौंप कर भारतीय जनता पार्टी ने उनके प्रति अपना भरोसा कायम रखा है। तीन साल यानी अगले आम चुनावों तक वे पार्टी के अध्यक्ष बने रहेंगे। पिछले लोकसभा चुनावों में भाजपा को मिली भारी कामयाबी के पीछे अमित शाह की रणनीतिक कुशलता और प्रबंधन की अहम भूमिका मानी जाती है। खासकर उत्तर प्रदेश में, जहां पार्टी का आधार काफी कमजोर हो गया था, अमित शाह के प्रभारी रहते पार्टी को अस्सी में से इकहत्तर सीटें मिली थीं। पुरस्कार-स्वरूप उन्हें पार्टी की कमान सौंपी गई। मगर दिल्ली और बिहार के विधानसभा चुनावों में भाजपा को मिली करारी हार के बाद अमित शाह के पार्टी अध्यक्ष बने रहने को लेकर शंका जताई जाने लगी थी। मगर भाजपा ने उन सारे कयासों पर विराम लगा दिया है। अब चुनौतियां अमित शाह के सामने हैं। अगर वे उन चुनौतियों से पार पाते हैं तो निस्संदेह भाजपा का आधार और मजबूत होगा। उनके सामने पहली चुनौती है कि वे किस तरह सरकार और पार्टी के बीच तालमेल बनाए रखते हैं। उनकी ताजपोशी के मौके पर लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी जैसे नेता नहीं आए। इससे एक बार फिर यही जाहिर हुआ कि पार्टी के कई नेता और कार्यकर्ता नरेंद्र मोदी और अमित शाह की कार्यप्रणाली से नाराज हैं। उनकी नाराजगी पार्टी के लिए अच्छा संकेत नहीं मानी जा सकती। इसके अलावा पार्टी के कुछ लोग केंद्र में सरकार बनने के बाद इस कदर मनमाना व्यवहार करने लगे हैं कि उससे न सिर्फ पार्टी की छवि पर आंच आ रही है, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए अपनी विकास योजनाओं को गति देना मुश्किल साबित हो रहा है। इसे साधना अमित शाह की जिम्मेदारी है।

अभी तक भाजपा केंद्र में सरकार बनने की खुशी मनाती नजर आ रही है। मगर अब सोचने का वक्त है कि चुनाव से पहले और सरकार बनने के बाद की स्थितियां बिल्कुल भिन्न होती हैं। केंद्र सरकार लगातार नई योजनाओं की घोषणा कर रही है, विकास के वादों की गूंज है, प्रधानमंत्री विदेश यात्राओं के जरिए रोज नई दोस्ती के समीकरण रच रहे हैं, मगर जमीनी हकीकत यह है कि आम लोगों में सरकार के कामकाज को लेकर उत्साह नहीं दिखता। अच्छे दिन आने की उम्मीद धूमिल पड़ गई है। भाजपा ने सदस्यता अभियान चला कर कार्यकर्ताओं की बड़ी फौज तो जमा कर ली है, पर उनमें से कितने उसके साथ स्थायी रूप से टिके रहेंगे, कहना मुश्किल है। इस साल पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव होने हैं। इनमें से केरल, तमिलनाडु जैसे राज्यों में भाजपा की ताकत सिर्फ अपने दम पर मुकाबले में रहने की नहीं है। शाह के सामने एक चुनौती ऐसे राज्यों में सहयोगी तलाशने की भी है। करीब साल भर बाद उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव होंगे। वह अमित शाह के लिए असली परीक्षा की घड़ी होगी। उसी से अगले लोकसभा चुनाव के रुझान भी तय होंगे। अमित शाह के सामने एक मुश्किल काम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा के संबंधों को शंका-रहित बनाना भी है। भाजपा पर संघ के हावी रहने का नतीजा यह है कि कुछ नेताओं-कार्यकर्ताओं के निरंकुश व्यवहार के चलते मोदी सरकार के लिए आए दिन मुश्किलें पैदा हो रही हैं। अगर आगे भी यही हाल रहा तो न सिर्फ सरकार, बल्कि पार्टी के लिए भी मुश्किलें बनी रहेंगी।

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