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संकट के बीच

यह लगातार तीसरा साल होगा जब कोरोना संकट के बीच एक फरवरी को आम बजट आएगा।

Union Budget 2022
आम बजट से लोगों की उम्‍मीदें।

यह लगातार तीसरा साल होगा जब कोरोना संकट के बीच एक फरवरी को आम बजट आएगा। हालांकि पिछले दो सालों के मुकाबले हालात इस बार उतने खराब नहीं हैं। पर यह कहना भी सही नहीं होगा कि अर्थव्यवस्था संकट से निकल चुकी है। पिछले दो साल में अर्थव्यवस्था ने जिस तरह की भारी गिरावट झेली है, उद्योग-धंधे चौपट हुए हैं और उत्पादन गिरा है, उसका असर लंबे समय तक बने रहने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। आर्थिक वृद्धि दर को लेकर तरह-तरह के अनुमान लगाए जा रहे हैं। पर आने वाले दिनों में होगा क्या, कोई नहीं जानता।

सरकार की प्राथमिकता अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की है। ऐसे में इस बार भी सरकार बजट में ऐसे कदमों को ही प्राथमिकता दे सकती है जो अर्थव्यवस्था को रफ्तार देने वाले हों। इसके लिए ढांचागत परियोजनाओं पर खर्च करने पर जोर देना पड़ेगा। इधर उद्योग जगत पहले ही करों में राहत से लेकर दूसरी रियायतों की मांग कर रहा है। वहीं छोटे और मझोले उद्योग अभी तक भी महामारी से उपजे संकट से उबर नहीं पाए हैं। इसलिए देखने की बात यह होगी कि सरकार अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले एमएसएमई क्षेत्र के लिए क्या बड़े कदम उठाती है।

बजट पर हर किसी की निगाहें इसलिए भी टिकी होती हैं कि कहीं कुछ मिल जाने की उम्मीद रहती है, चाहे व्यापारी हों या फिर आम आदमी। जहां तक सवाल है आम आदमी का, तो वह ऐसा बजट चाहता है जिसमें कर रियायतें हों, महंगाई बढ़ाने वाला न हो और बचत बढ़ाने वाला हो। आज आम आदमी जिन मुश्किलों से जूझ रहा है, उसमें बजट से उम्मीदें और बढ़ जाना कोई गलत नहीं है। पिछले दो सालों में महामारी से पैदा हालात ने आम आदमी की जेब पर बुरा असर डाला है। बचत तो दूर की बात, रोजाना का खर्च चलाना लोगों को भारी पड़ रहा है।

दो साल के दौरान करोड़ों लोगों का रोजगार चला गया। बेरोजगारी दर अब भी रेकार्ड स्तर पर बनी हुई है। इसका असर यह हुआ है कि लोगों की आमद घट गई है। फिर महंगाई ने सबको रुला रखा है। रसोई गैस, पेट्रोल-डीजल की लगातार बढ़ती कीमतों ने महंगाई बढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। रोजमर्रा के इस्तेमाल के सामान से लेकर खाने-पीने की लगभग सारी चीजों के दाम आसमान छू रहे हैं। इसलिए अब लोग उम्मीद कर रहे हैं कि सरकार बजट में कुछ ऐसे प्रावधान करे जो महंगाई घटाने वाले हों।

कोरोना संकट ने हमें जो सबसे बड़ा सबक सिखाया है वह यह कि हम अब स्वास्थ्य सुविधाओं पर खर्च बढ़ाएं। हालांकि पिछली बार स्वास्थ्य क्षेत्र के बजट में थोड़ी बढ़ोतरी की गई थी, लेकिन उसे पर्याप्त नहीं कहा जा सकता। सरकार को ऐसी योजनाओं पर ज्यादा गौर करने की जरूरत है जो रोजगार पैदा करने वाली हों। एक बड़ा संकट ब्याज दरों का न्यूनतम स्तर पर बने रहना भी है।

इससे उन करोड़ों लोगों की आमद घट गई है जिनकी आय का जरिया ही ब्याज से मिलने वाला पैसा है। इसका असर लघु बचतों की दरों पर भी पड़ा है। बजट में बचत के नए विकल्पों के साथ उन उपायों पर भी गौर करना होगा जो ब्याज दरों को बढ़ाने का रास्ता साफ करें। सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का दायरा बढ़ाने की जरूरत और बढ़ गई है। बजट राहत देने वाला तभी हो पाएगा जब उसमें आम आदमी को रोजगार देने और आमद बढ़ाने के उपाय हों। वरना और लोगों को गरीबी के गर्त में जाते देर नहीं लगने वाली।

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