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संपादकीय: चीन की चाल

वास्तविक नियंत्रण रेखा के साथ जिस क्षेत्र में चीनी सैनिकों ने तंबू गाढ़े हैं, वह भारत का हिस्सा है। पूर्वी लद्दाख की इस वास्तविक नियंत्रण रेखा को लेकर दोनों देशों की सेनाओं के बीच एक अलिखित समझौता हुआ था, जिसमें एक दूसरे के क्षेत्र का सम्मान करने और अतिक्रमण नहीं करने की बात कही गई थी। लेकिन अब चीन इसका उल्लंघन कर रहा है।

Author Published on: May 27, 2020 12:29 AM
भारत-चीन के सैनिक पिछले एक हफ्ते से लद्दाख से लगी LAC पर आमने-सामने हैं।

लद्दाख के पूर्वी हिस्से में वास्तविक नियंत्रण रेखा के करीब पैंगोंग झील और गलवां घाटी के आसपास इन दिनों चीनी सेना की जो गतिविधियां देखने को मिल रही हैं, वे किसी भी रूप में सामान्य नहीं कही जा सकतीं। चीनी सेना ने हफ्ते भर में इस क्षेत्र में करीब सौ तंबू गाढ़ दिए और बड़ी संख्या में सैनिकों को यहां तैनात कर दिया। इस इलाके में बंकर बनाने के लिए मशीनें भी लाई गई हैं। बंकरों का निर्माण स्थायी रूप से चौकियों और मोर्चा संभालने के लिए किया जाता है।

इसलिए सवाल है कि चीन की इन गतिविधियों को किस रूप में देखा जाए। क्या चीन किसी लड़ाई की तैयारी में है? क्या इस तरह के फौजी जमावड़े से वह भारत को धमका रहा है, या फिर भारतीय क्षेत्र में अतिक्रमण कर और क्षेत्रों को विवादित बनाने की दिशा में बढ़ रहा है। भारतीय क्षेत्र में घुसपैठ की हरकत बता रही है कि चीन एक बार फिर से डोकलाम घटनाक्रम को दोहरा कर भारत पर दबाव बनाने की सुनियोजित रणनीति पर चल रहा है।

वास्तविक नियंत्रण रेखा के साथ जिस क्षेत्र में चीनी सैनिकों ने तंबू गाढ़े हैं, वह भारत का हिस्सा है। पूर्वी लद्दाख की इस वास्तविक नियंत्रण रेखा को लेकर दोनों देशों की सेनाओं के बीच एक अलिखित समझौता हुआ था, जिसमें एक दूसरे के क्षेत्र का सम्मान करने और अतिक्रमण नहीं करने की बात कही गई थी। लेकिन अब चीन इसका उल्लंघन कर रहा है।

चीन इस इलाके में पहले भी घुसपैठ करता रहा है। लेकिन इस बार मामला गंभीर इसलिए है कि घुसपैठ इस इलाके में स्थायी कब्जे की नीयत से की गई है। इससे पहले कभी यहां न तंबू लगाने की कोशिशें हुई थीं, न बड़ी संख्या में चीनी सैनिकों को तैनात किया गया था। वास्तविक नियंत्रण पर तीन ऐसे ठिकाने हैं जहां भारत और चीन के सैनिक इस वक्त आमने-सामने हैं। हालांकि इस तरह की घुसपैठ को लेकर अक्सर ये तर्क दिए जाते हैं कि वास्तविक नियंत्रण रेखा कोई खींची हुई लकीर तो है नहीं, ऐसे में भूलवश सैनिकों का इधर-उधर हो जाना सामान्य घटना है और ऐसे विवादों को सैन्य अधिकारी बातचीत के जरिए सुलझा लेते हैं।

लेकिन अब चीन को यह समझ जाना चाहिए कि डोकलाम की तनातनी का अंत क्या हुआ था। साल 2017 में करीब ढाई महीने तक भारत और चीन के सैनिक डोकलाम में आमने-सामने डटे रहे थे। लद्दाख में भी आज भारत मजबूत स्थिति में है। भारतीय सेना ने जो आॅल वैदर रोड का स्थायी ढांचा खड़ा करने में कामयाबी हासिल कर ली है, उससे सैनिकों को बहुत ही कम वक्त में वास्तविक नियंत्रण रेखा तक भेजा सकता है। इस इलाके में भारतीय वायुसेना भी काफी मजबूत स्थिति में है।

चीन लद्दाख क्षेत्र में भारत की इस बढ़ती ताकत से परेशान है और यहां उसकी बढ़ती सैन्य गतिविधियां हताशा का नतीजा ही हैं। जो हो, दोनों देशों के लिए समस्या की जड़ सीमा विवाद है। जब तक सीमा विवाद का कोई स्थायी हल नहीं निकलेगा, तब तक इस तरह के हालात से दो-चार होता रहना पड़ेगा। सच्चाई तो यह है कि चीन चाहता भी नहीं कि सीमा विवाद हल हो, क्योंकि इसकी आड़ में वह भारत को हमेशा घेरे रखना चाहता है। ऐसे में भारत के पास एक ही रास्ता है कि चीन की गतिविधियों का उसी की भाषा में करारा जवाब दे।

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