पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष से पैदा हुए संकट का दायरा लगातार बढ़ता जा रहा है। इसका सबसे ज्यादा असर ऊर्जा और आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति पर पड़ रहा है, जिससे इनकी कीमतों में इजाफा होना स्वाभाविक है।
महंगाई अब आम आदमी की जेब पर भारी पड़ने लगी है और निश्चित तौर पर इसका प्रभाव देश की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा। यही वजह है कि भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआइ) ने शुक्रवार को आर्थिक वृद्धि दर के अनुमान को 6.9 फीसद से घटाकर 6.6 फीसद, जबकि खुदरा महंगाई दर के अनुमान को 4.6 फीसद से बढ़ाकर 5.1 फीसद कर दिया है।
हालांकि, सरकार का लक्ष्य महंगाई दर को चार फीसद के दायरे में सीमित रखने का है, लेकिन सवाल है कि वर्तमान में जो परिस्थितियां बनी हैं, उस लिहाज से क्या इस लक्ष्य को हासिल किया जा सकेगा, या फिर यह आंकड़ा महज सरकारी कागजों में दिखाने के लिए ही रह जाएगा। यह आशंका इसलिए व्यक्त की जा रही है, क्योंकि सरकार की ओर से मौजूदा संकट से निपटने के लिए कोई ठोस एवं विस्तृत रूपरेखा अभी तक सामने नहीं आई है।
आरबीआइ ने प्रमुख नीतिगत दर रेपो को 5.25 फीसद पर बरकरार रखा है और इसे आम लोगों के लिए राहत के रूप में पेश किया जा रहा है। मगर इसका दूसरा पहलू यह है कि पहले से ही महंगाई से जूझ रहे समाज के एक वर्ग को उम्मीद थी कि रेपो दर में कुछ कमी की जाएगी, जिससे उन्हें अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए बैंक से कर्ज लेने और मासिक किस्त चुकता करने में आसानी होगी।
गौरतलब है कि रेपो दर में कमी और वृद्धि से ब्याज दरें भी घटती एवं बढ़ती हैं, जिसका सीधा असर बैंकों से कर्ज लेने वालों की मासिक भुगतान किस्त पर पड़ता है। यह बात स्पष्ट है कि बढ़ते वैश्विक तनाव, वस्तुओं की ऊंची कीमतें और आपूर्ति में समस्या देश के आर्थिक परिदृश्य के लिए जोखिम पैदा कर रहे हैं।
कच्चे तेल के दामों में आए उछाल और विदेशी संस्थागत निवेशकों की रिकार्ड पूंजी निकासी के कारण रुपया इस वर्ष डालर के मुकाबले छह फीसद से अधिक टूटा है। इसके साथ ही विदेशी मुद्रा भंडार पर भी दबाव बढ़ रहा है। ऐसे में अगर समग्र रूप से कारगर कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले दिनों में स्थिति और ज्यादा बिगड़ने से इनकार नहीं किया जा सकता।
देश की अर्थव्यवस्था के लिए जोखिम सिर्फ पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष की वजह से ही नहीं है, बल्कि घरेलू मोर्चे पर भी कई तरह की चुनौतियां स्थिति को जटिल बना रही हैं। मसलन, आरबीआइ ने अपनी रिपोर्ट में सामान्य से कम मानसून के अनुमान और अल-नीनो के कारण उत्पन्न जोखिमों का भी उल्लेख किया है। साथ ही कहा कि इससे आने वाले महीनों में खाद्य पदार्थों की कीमतों पर दबाव और ज्यादा बढ़ सकता है। यानी महंगाई का सिलसिला फिलहाल थमने वाला नहीं है।
आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार महंगाई पर नियंत्रण की तुलना में आर्थिक वृद्धि के प्रयासों पर ज्यादा जोर दे रही है। इससे भले ही अर्थव्यवस्था के आंकड़ों में सुधार नजर आ सकता है, लेकिन महंगाई के बढ़ते बोझ से आम लोगों के लिए जीवन-यापन करना कठिन हो जाएगा। इसलिए जरूरी है कि सरकार ऐसे कदम उठाएं, जिससे आर्थिक वृद्धि और महंगाई के बीच संतुलन कायम हो और पश्चिम एशिया में संघर्ष से उपजे संकट के असर को भी कम किया जा सके।
