पाबंदियों के बीच

महामारी से गंभीर होते हालात के मद्देनजर दिल्ली व दूसरे राज्यों को जिस तरह की पाबंदियां लगाने को विवश होना पड़ रहा है।

तस्वीर का इस्तेमाल सिर्फ प्रस्तुतिकरण के लिए किया गया है। (एक्सप्रेस प्रतीकातम्क फोटो)

महामारी से गंभीर होते हालात के मद्देनजर दिल्ली व दूसरे राज्यों को जिस तरह की पाबंदियां लगाने को विवश होना पड़ रहा है, उसके अलावा कोई विकल्प दिखता भी नहीं है। दिल्ली आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (डीडीएमए) ने अब सभी निजी दफ्तरों को भी बंद कर दिया है और लोगों से घर से काम करने को कहा है। इससे पहले दफ्तरों में पचास फीसद क्षमता के साथ काम करने की बात थी। पर अब संक्रमण का रोजाना का आंकड़ा जिस तेजी से बढ़ रहा है, उसे देखते हुए और जोखिम नहीं लिया जा सकता। दिल्ली में संक्रमण दर पच्चीस फीसद को छू चुकी है। यह मामूली नहीं है।

आने वाले दिनों में इसके और बढ़ने की आशंका से भी इनकार नहीं किया जा सकता। इसलिए पाबंदियों को बेहद जरूरी उपायों के रूप में देखना होगा। हालांकि दिल्ली सरकार ने रेस्तरां और शराबखानों के लिए अब तक कुछ रियायतें दी थीं, लेकिन देखने में आ रहा था कि इन जगहों पर भीड़ बढ़ती जा रही है। सख्त पाबंदियां लगाने के पीछे मकसद यही है कि लोग बेवजह घरों से न निकलें और संक्रमण के प्रसार को रोका जा सके।

दिल्ली, मुंबई सहित अन्य छोटे-बड़े शहरों में भी बड़ी समस्या यही है कि सड़कों पर होने वाली भीड़ की समस्या से निपटा कैसे जाए। हालांकि लाखों लोगों के सामने बड़ी मजबूरी रोजाना कमाने-खाने की होती है। इसलिए काम पर जाना विवशता है। ऐसे लोगों की संख्या भी लाखों में है जो छोटे उद्योगों, फैक्टरियों में काम करते हैं। रेहड़ी-पटरी दुकानदारों के लिए मुश्किल यह है कि इस तरह की पाबंदियां उनकी कमाई का जरिया बंद कर देती हैं। हालांकि दिल्ली आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने इन बातों का खयाल रखा है और नगर निगम के हर जोन में रोजाना एक साप्ताहिक बाजार लगाने की इजाजत दी है, ताकि छोटे-मोटे काम करने वालों की रोजी-रोटी भी चलती रहे।

वरना देखने में यह आया है कि बाजारों में बेवजह भीड़ उमड़ती है और लोग बिना मास्क लगाए और सुरक्षित दूरी की चिंता किए बगैर घूमते रहते हैं। दिल्ली के सरोजनी नगर और लाजपत नगर जैसे मध्यवर्गीय बाजारों की चौंकाने वाली तस्वीरें हम देखते ही रहे हैं। इसलिए अब न सिर्फ दिल्ली सरकार बल्कि दूसरी राज्य सरकारों की भी प्राथमिकता यही होनी चाहिए कि जब तक तीसरी लहर का असर कम न पड़ जाए, तब तक सख्त पाबंदियां लगाएं और उन पर अमल सुनिश्चित करवाएं। वरना फिर से पूर्णबंदी जैसे हालात का सामना करने की नौबत आ सकती है।

देश के ज्यादातर हिस्सों से संक्रमण के चिंताजनक आंकड़े आ रहे हैं। इसलिए ज्यादातर राज्यों ने अपने यहां रात का कर्फ्यू लगाया है। दफ्तरों में पचास फीसद लोगों को ही आने दिया जा रहा है। पर इतने भर से काम नहीं चलने वाला। महाराष्ट्र के हालात ज्यादा खराब हैं, वहां सरकार आंशिक पूर्णबंदी जैसे कदम अब उठा रही है, जो कि पहले ही उठा लिए जाने चाहिए थे।

समस्या उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, मणिपुर और गोवा जैसे राज्यों की भी है जहां अगले महीने से चुनाव होने वाले हैं। चुनावी प्रचार के दौरान भीड़ को काबू करना कम बड़ी चुनौती नहीं है। और सबसे हैरानी की बात तो यह कि कर्नाटक में मेकेदातु बांध परियोजना की मांग को लेकर कांग्रेस की पदयात्रा निकल रही है। हजारों लोग इसमें शामिल हैं। ऐसे में संक्रमण को फैलने से कौन रोक सकता है? पाबदियां न लगें, सख्ती कम से कम हो, इसके लिए क्या खुद लोगों को और हमारे राजनीतिक दलों अपनी जिम्मेदारी नहीं समझनी चाहिए?

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