ईरान पर अमेरिका और इजराइल के साझा हमले के बाद करीब एक पखवाड़े पहले बहुत मुश्किल से दो सप्ताह के युद्धविराम पर सहमति बनी थी। फिर दोनों पक्षों के बीच बातचीत की शुरुआत से यह उम्मीद जगी कि वे युद्ध को पूरी तरह खत्म करने पर राजी हो जाएंगे। मगर आज युद्धविराम की अवधि पूरी होने के बाद भी जैसे हालात दिख रहे हैं, उसमें ईरान और अमेरिका के तेवर समाधान की संभावना के सामने एक बड़ी चुनौती हैं।
दूसरी ओर, इस युद्ध के नतीजे में उपजी विकट और जटिल होती परिस्थितियों के बीच ये सवाल उठने लगे हैं कि आखिर अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच जारी युद्ध का हासिल क्या होगा और उसका खमियाजा दुनिया के कितने देशों को कब तक भुगतना पड़ेगा। खासतौर पर होर्मुज जलमार्ग को बाधित किए जाने के बाद बहुत सारे देशों में जिस तरह प्राकृतिक गैस और तेल का जैसा संकट खड़ा हो गया है, उसे देखते हुए स्वाभाविक ही यह मांग उठने लगी है कि अमेरिका और ईरान का रुख चाहे जो हो, उन्हें वैश्विक हित में खुद को नरम करना चाहिए और किसी भी तरह से युद्ध खत्म हो।
यह छिपा नहीं है कि इजराइल और अमेरिका के हमले की प्रतिक्रिया में ईरान ने जब होर्मुज जलमार्ग को रोक दिया, तब से भारत सहित दुनिया के कई देशों में प्राकृतिक गैस और तेल की आपूर्ति व्यापक पैमाने पर बाधित हुई है और वहां का जनजीवन बुरी तरह बाधित हुआ है। ये देश युद्ध में शामिल नहीं हैं, लेकिन उसकी मार से पीड़ित हैं।
दरअसल, होर्मुज जलमार्ग के जरिए दुनिया के अलग-अलग देशों में बीस फीसद से ज्यादा ऊर्जा की आपूर्ति होती है। मगर जब से इस मार्ग को बाधित किया गया है, लगभग सभी प्रभावित देशों में लोग न केवल रसोई गैस और पेट्रोल-डीजल के संकट का सामना कर रहे हैं, बल्कि रोजमर्रा की जरूरतों के सभी सामान के महंगे होने का दंश भी झेल रहे हैं। इस बीच पाकिस्तान की मध्यस्थता में इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत भी हुई, मगर वह आखिर विफल रही। अब वैश्विक स्तर पर यह उम्मीद की जा रही है कि अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध को खत्म करने के लिए फिर से बातचीत आगे बढ़े।
अफसोस की बात यह है कि एक ओर अमेरिकी नौसेना की ओर से ईरानी जहाज जब्त करने से लेकर युद्धविराम खत्म होने के बाद ईरान पर ढेरो बम गिराने के ट्रंप की धमकी सामने आ रही है, तो दूसरी ओर अमेरिकी हरकतों को युद्धविराम का उल्लंघन बताते हुए ईरान ने भी वार्ता के अगले दौर में हिस्सा लेने को लेकर अनिच्छा जाहिर की है। सवाल यह है कि युद्धविराम पर सहमत होने के बावजूद अमेरिका की ओर से ऐसे आक्रामक बयान क्यों जारी किए जा रहे हैं और कूटनीतिक स्तर पर बातचीत को आगे बढ़ाने के प्रति गंभीरता क्यों नहीं दिखाई जा रही है।
इस तरह के तीखे तेवरों का हासिल यह सामने आ रहा है कि रविवार को भी कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में भारी उछाल दर्ज किया गया। इसके अलावा भी ईरान सहित खाड़ी देशों के तेल ठिकानों पर जिस पैमाने के हमले हुए हैं, उनका असर वैश्विक तेल कीमतों पर पड़ना तय है। इससे ज्यादा त्रासद यह है कि इस सबका वैश्विक अर्थव्यवस्था पर दीर्घकालिक असर पड़ेगा, जिससे उबरना सभी देशों के लिए चुनौती साबित हो सकता है। एक तरह से स्पष्ट और दूरगामी विपरीत प्रभाव की आशंका के बावजूद युद्ध की स्थिति को बनाए रखने का क्या औचित्य है?
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अमेरिका और ईरान दोनों ने संकेत दिया है कि वे पाकिस्तान में होने वाली शांति वार्ता के दूसरे दौर में शामिल हो सकते हैं। यह तब हो रहा है जब दोनों देश सार्वजनिक रूप से एक-दूसरे को कड़ी चेतावनी भी दे रहे हैं और दो हफ्ते का सीजफायर खत्म होने वाला है। इस बात की जानकारी अधिकारियों ने दी है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सीएनबीसी को बताया कि वे इस सीजफायर को आगे बढ़ाने के पक्ष में नहीं है। इससे यह संकेत मिलता है कि चल रही बातचीत पर दबाव बढ़ सकता है। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक
