अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के चीन दौरे से यह उम्मीद की जा रही थी कि पश्चिम एशिया में संघर्ष का कोई हल निकलेगा, जिससे वैश्विक स्तर पर गहरा रहे संकट से राहत मिलेगी। मगर दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व के बीच हुई वार्ता के नतीजों से यह साफ है कि विश्व की आर्थिक महाशक्तियों को बाकी दुनिया की कोई फिक्र नहीं है।

खबरों के मुताबिक, बैठक द्विपक्षीय मसलों पर ही केंद्रित रही और ट्रंप ने इसे ‘जी-2’ देशों का सम्मेलन बताया, जिसमें दोनों देशों के बीच कई व्यापारिक समझौते हुए। सवाल है कि खुद को दुनिया के सबसे ताकतवर बताने वाले देशों की क्या वैश्विक समुदाय के प्रति कोई जिम्मेदारी नहीं है, क्या उनकी यह ताकत सिर्फ निहित स्वार्थों तक ही सीमित है?

पिछले कुछ वर्षों से विश्व के आर्थिक हितों को देखने के अमेरिका के नजरिए में बदलाव साफ नजर आ रहा है। अब यह साझा उदार मूल्यों पर नहीं, बल्कि महाशक्तियों के प्रभाव क्षेत्रों पर केंद्रित होता दिख रहा है। ऐसे में सवाल यह नहीं है कि अमेरिका और चीन परस्पर सहयोग कर सकते हैं या नहीं, बल्कि यह है कि उनके बीच तालमेल संभव हो सका, तो वह किस तरह की वैश्विक व्यवस्था तैयार करेगा।

दो देशों का समूह यानी ‘जी-2’ शब्द वर्ष 2005 में अमेरिका के एक प्रमुख अर्थशास्त्री ने गढ़ा था। उनका विचार था कि दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं अमेरिका और चीन के बीच मजबूत साझेदारी होनी चाहिए। इस विचार का उद्देश्य प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के समूह ‘जी-20’ को और मजबूत करना था। तब वैश्विक वित्तीय संकट से निपटने के लिए ‘जी-20’ की रणनीति के तहत अमेरिका ने शुरुआती दौर में 787 अरब डालर, जबकि चीन ने 586 अरब डालर का प्रोत्साहन पैकेज दिया था। इससे दुनिया को बड़े आर्थिक संकट से बचाने में मदद मिली।

मगर पश्चिम एशिया में संघर्ष से उपजे वैश्विक संकट के बीच हाल में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच हुई वार्ता में वैश्विक चिंताओं के बजाय परस्पर हितों की एक नई तस्वीर उभरकर सामने आई है। दोनों देशों के बीच बोइंग विमानों की खरीद समेत कई अहम व्यापारिक समझौते हुए हैं। यानी अब अमेरिका-चीन सहयोग का मतलब यह नहीं है कि उससे दुनिया के बाकी देशों के लिए सकारात्मक माहौल बनेगा, बल्कि यह एक ऐसे निजी समझौते की तरह दिखाई देता है, जिसमें दो महाशक्तियां सिर्फ अपने हित साध रही हैं।

गौरतलब है कि होर्मुज जलमार्ग के बाधित होने से वैश्विक स्तर पर ऊर्जा समेत कई आवश्यक वस्तुओं का संकट पैदा हो गया है। अमेरिका और ईरान के अड़ियल रवैये की वजह से शांति वार्ता आगे नहीं बढ़ पा रही है, जिसका असर तमाम देशों की अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है। इसमें दोराय नहीं कि शांति वार्ता के लिए एक प्रभावी मध्यस्थ की जरूरत है और चीन इसमें अहम भूमिका निभा सकता है। मगर अमेरिका और चीन के राष्ट्राध्यक्षों की मुलाकात में इस मसले को तवज्जो नहीं देने को किस रूप में देखा जाएगा।

खबरों के मुताबिक, इस दौरान ताइवान का मसला जरूर उठा और इस पर चीन ने अमेरिका को चेताते हुए कहा कि यदि इस मुद्दे को सही ढंग से नहीं संभाला गया, तो दोनों देशों के बीच टकराव की स्थिति पैदा हो सकती है। इससे स्पष्ट है कि इन दोनों महाशक्तियों के लिए वैश्विक संकट के बीच भी सिर्फ अपने व्यापारिक, रणनीतिक और भू-राजनीतिक हित ही सर्वाेपरि हैं।