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उम्मीद की घाटी

प्रधानमंत्री के साथ जम्मू-कश्मीर के राजनेताओं की बैठक जिस गर्मजोशी और भरोसे के साथ संपन्न हुई, उससे जल्दी ही कश्मीर में जम्हूरियत की बहाली और आम लोगों के जीवन में बेहतरी के रास्ते खुलने की सूरत बनी है।

जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म किए जाने के करीब दो साल बाद यह पहला मौका था, जब कश्मीरी नेता और केंद्र के बीच संवाद स्थापित हुआ। फाइल फोटो।

प्रधानमंत्री के साथ जम्मू-कश्मीर के राजनेताओं की बैठक जिस गर्मजोशी और भरोसे के साथ संपन्न हुई, उससे जल्दी ही कश्मीर में जम्हूरियत की बहाली और आम लोगों के जीवन में बेहतरी के रास्ते खुलने की सूरत बनी है। हालांकि इस बैठक का एजेंडा पहले से तय नहीं था, यह खुली बैठक थी और गुपकार के नेता अपने-अपने एजेंडे लेकर आए थे, मगर यह स्पष्ट था कि बातचीत मुख्य रूप से पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने और विधानसभा चुनाव कराने पर ही केंद्रित होगी। वही हुआ।

सारे नेताओं ने अपने दलीय सिद्धांतों के अनुसार एजेंडे रखे, पर सभी का जोर जल्दी चुनाव कराने और पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने, वहां के लोगों की जमीन-जायदाद की सुरक्षा और विस्थापित कश्मीरी पंडितों के पुनर्वास पर था। केंद्र ने भी कश्मीरी अवाम के हित में हर संभव कदम उठाने का आश्वासन दिया। जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म किए जाने के करीब दो साल बाद यह पहला मौका था, जब कश्मीरी नेता और केंद्र के बीच संवाद स्थापित हुआ। इससे यह साफ संकेत मिला है कि केंद्र का रुख अब पहले जैसा कठोर नहीं है और न ही कश्मीरी नेता केंद्र से किसी तरह की तनातनी चाहते हैं। इस तरह पहली बार केंद्र और राज्य के बीच लंबे समय से बनी हुई दूरी काफी कुछ खत्म हुई है।

कश्मीरी नेताओं के इस बैठक में उत्साहपूर्वक हिस्सा लेने के पीछे एक वजह तो यह भी थी कि उन्हें अखिरकार वहां के अवाम के बीच ही सियासत करनी है और वे अगर किसी मसले पर अड़ कर इस बैठक में शिरकत न करते, तो राज्य में उन्हें मुश्किलों का सामना करना पड़ता। फिर यह भी कि वहां लोकतंत्र की बहाली जितने समय तक टलती रहेगी, उतने समय तक उनकी सियासी हैसियत भी हाशिये पर पड़ी रहेगी। इसलिए सभी दल चाहते हैं कि वहां जल्दी चुनाव हों। केंद्र सरकार भी यही चाहती है, इसलिए इसमें कोई अड़चन नहीं आएगी।

अब इसके लिए लंबे समय से टलती आ रही परिसीमन की प्रक्रिया को भी आगे बढ़ाने का रास्ता खुलेगा। इस तरह नए कश्मीर का स्वरूप भी उभर कर सामने आएगा। जहां तक पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने की बात है, केंद्र सरकार शुरू से कहती आ रही है कि वह स्थितियां अनुकूल होने पर इसकी प्रक्रिया शुरू कर देगी। इस वक्त घाटी में स्थितियां काफी बेहतर हैं। सीमा पर बेवजह तनाव पैदा करने की कोशिशें नहीं हो रहीं, आतंकवादी गतिविधियां भी काफी कम हो गई हैं। इसलिए परिसीमन के बाद पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने में शायद केंद्र को कोई परेशानी न हो।

यह बात कश्मीरी राजनेता भी जानते हैं कि कश्मीर का विशेष दर्जा वापस दिलाना संभव नहीं होगा। केंद्र ने इसे खत्म ही इसलिए किया था कि सारे देश में एक जैसे कानून लागू हों। इसीलिए कुछ नेताओं ने प्रस्ताव रखा है कि कश्मीरी लोगों की जमीन-जायदाद की सुरक्षा और नौकरियों में उनकी हिस्सेदारी को लेकर कुछ विशेष प्रावधान किए जाएं, जैसा कि धारा पैंतीस-ए में था। केंद्र सरकार इस प्रस्ताव पर शायद विचार करे। अच्छी बात यह है कि कश्मीरी नेताओं के सकारात्मक रुख की वजह से वहां लोकतंत्र की बहाली का रास्ता खुला है, राजनीतिक गतिविधियों के लिए वातावरण बनना शुरू हुआ है। इस बैठक से अंतरराष्ट्रीय बिरादरी में भी सकारात्मक संदेश गया है। अगर कश्मीरी दलों का यही सकारात्मक रुख बना रहा, तो जल्दी ही घाटी में अमन और तरक्की के रास्ते खुलेंगे।

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