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संपादकीयः विनिवेश के सहारे Air India

एअर इंडिया को खरीदेगा, उसे यह सौदा भारी पड़ेगा क्योंकि सौदे की शर्तों के हिसाब से कर्ज का एक बड़ा हिस्सा उसे ही चुकाना होगा। फिर कंपनी एक दिन में तो मुनाफे में आने वाली नहीं, जो शुरू होते ही मोटा मुनाफा देने लगे।

Author Published on: January 29, 2020 2:32 AM
मोदी सरकार एयर इंडिया में हिस्सेदारी बेचना चाहती है। ( Express Photo)

दो साल तक हाथ-पैर मारने के बाद आखिरकार एअर इंडिया के विनिवेश का रास्ता साफ हो गया है। उम्मीद की जानी चाहिए कि इस बार कंपनी को कोई खरीदार मिल जाएगा और उसके अच्छे दिन लौट आएंगे। सरकार ने भारी कर्ज से लदी इस कंपनी को बेचने के लिए अब जिस तरह से शर्तों में ढील दी है और नियम-कानूनों को लचीला बनाया है, उससे साफ है कि किसी भी कीमत पर वह इससे पिंड छुड़ाना चाह रही है। एअर इंडिया को बेचने के लिए 17 मार्च तक निविदाएं मांगी गई हैं और वित्त वर्ष के अंतिम दिन यानी 31 मार्च तक इसके नए खरीदार या खरीदारों का चयन कर लिया जाएगा।

लेकिन जो भी एअर इंडिया को खरीदेगा, उसे यह सौदा भारी पड़ेगा क्योंकि सौदे की शर्तों के हिसाब से कर्ज का एक बड़ा हिस्सा उसे ही चुकाना होगा। फिर कंपनी एक दिन में तो मुनाफे में आने वाली नहीं, जो शुरू होते ही मोटा मुनाफा देने लगे। विमानन क्षेत्र पहले से ही गंभीर संकटों से जूझ रहा है, कड़ी प्रतिस्पर्धा के बीच ज्यादातर कंपनियां भारी कर्ज में डूबी पड़ी हैं, कई बंद हो गईं। ऐसे में नई कंपनी का टिक पाना कम चुनौती पूर्ण नहीं होगा।

एअर इंडिया पिछले कुछ सालों से जिस तरह लगातार घाटे में जा रही थी, उससे साफ होता जा रहा था कि एक न एक दिन इस कंपनी का बिकना तय है। पहली बार 2001 में कंपनी को सत्तावन करोड़ रुपए का घाटा हुआ था। यह कोई बहुत बड़ी रकम नहीं थी, सरकार चाहती तो प्रबंधन को चुस्त-दुरुस्त बना कर घाटे की भरपाई कर सकती थी। लेकिन 2007 में जब एअर इंडिया में इंडियन एअरलाइंस का विलय कर एक कंपनी बना दी गई तो दोनों कंपनियों का कुल घाटा सात हजार दो सौ करोड़ रुपए हो गया। यहीं से एअर इंडिया के बुरे दिन शुरू हो गए थे। पिछले साल कंपनी पर अट्ठावन हजार करोड़ रुपए का कर्ज था। आज यह कर्ज साठ हजार करोड़ से ऊपर निकल चुका है। अब जो भी एअर इंडिया को खरीदेगा वह तेईस हजार करोड़ रुपए चुकाएगा।

एक बात तो साफ है कि ज्यादातर सरकारी कंपनियां कुप्रबंधन और भ्रष्टाचार का शिकार होती गईं और बंदी के कगार पर पहुंची गईं और ज्यादातर का अंत विनिवेश के रूप में सामने आया। एअर इंडिया के संकट की वजह 2005 में एक सौ ग्यारह विमानों की खरीद के फैसले को माना जाता रहा है। इस सौदे पर सत्तर हजार करोड़ रुपए खर्च हुए थे। अगर यह सच है, जैसा कि विशेषज्ञ दावा करते रहे हैं, तो यह कहीं न कहीं शीर्ष स्तर के प्रबंधन की नीतिगत खामियों को परिलक्षित करता है। विमानों की खरीद से पहले क्या यह विचार नहीं हुआ होगा कि इतना बड़ा सौदा कंपनी के लिए व्यावहारिक भी होगा या नहीं। विनिवेश वाली ज्यादातर कंपनियां इसी लापरवाही भरे ढर्रे का शिकार हुई हैं।

कल तक जो सरकार एअर इंडिया की चौबीस फीसद हिस्सेदारी अपने पास रखने और खरीदारों के लिए कड़ी शर्तों पर अड़ी हुई थी, वह आज न सिर्फ सौ फीसद हिस्सेदारी बेचने को मजबूर है, बल्कि एअर इंडिया की मुनाफे में चलने वाली एअर इंडिया एक्सप्रेस में भी अपनी सौ फीसद हिस्सेदारी बेच रही है। तैंतीस हजार करोड़ का कर्ज चुकाने और बचे कर्मचारियों की जिम्मेदारी उठाने को भी सरकार तैयार है। खरीदारों की पात्रता संबंधी शर्तों में जिस तरह ढील दी गई है, उससे भी कई सवाल खड़े होते हैं। एक अच्छा, कुशल और दूरदृष्टि वाला प्रबंधन होता तो शायद एअर इंडिया को बेचने की नौबत ही नहीं आती।

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