जब भी कोई विमान हादसा होता है, तो उसके जांच निष्कर्षों का पहला सबक यही होना चाहिए कि भविष्य में उस तरह की खामियां किसी दुर्घटना का कारण न बनें। मगर विमान हादसों का सिलसिला जिस तरह बदस्तूर जारी है, उससे यह विश्वास करना मुश्किल है कि सबक लेने और सुधार की प्रक्रिया में कहीं कोई गंभीरता बरती जाती है। कहने को यात्रियों की सुरक्षा सरकार और विमानन कंपनियों के लिए सर्वोच्च प्राथमिकता है, लेकिन धरातल पर स्थिति कुछ और ही नजर आती है।
तकनीकी सतर्कता की कमी और मानव जनित गड़बड़ियों को दूर करने के लिए तमाम तरह के नियम बनाए गए हैं, मगर इनका सख्ती से पालन सुनिश्चित करने के लिए मजबूत तंत्र का अभाव आज भी साफ दिखाई देता है। इसका ताजा उदाहरण हाल में थाईलैंड के फुकेत से दिल्ली आ रही एयर इंडिया की उड़ान के साथ हुआ वह हादसा है, जिसमें विमान हवा में अचानक अनियंत्रित होकर तीन सौ फुट नीचे आ गया और सत्रह यात्री घायल हो गए। इस विमान में चालक दल के साथ कुल 145 यात्री सवार थे।
हादसे की प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि विमान के मुख्य पायलट ने मन:प्रभावी यानी नशीले पदार्थ का सेवन किया था। इससे हवाई सफर के दौरान यात्रियों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
देश में हवाई यात्रा की सुविधा का दायरा बढ़ाने के लिए विमान सेवाओं का भले ही विस्तार किया जा रहा है, विमान किराये में भी आए दिन बेलगाम तरीके से बढ़ोतरी होती रहती है, मगर सुरक्षा के मोर्चे पर मानकों के अनुरूप सतर्कता, सक्रियता और गंभीरता पर ध्यान कम ही दिया जाता है। यही वजह है कि कभी तकनीकी खराबी, कभी मानवीय चूक, तो कभी मौसम की अप्रत्याशित चुनौतियां विमान हादसों का कारण बनती हैं। फुकेत से दिल्ली आ रहे विमान के अनियंत्रित होने की वजह वायुमंडलीय अस्थिरता यानी एयर टर्बुलेंस बताई गई थी। हालांकि बाद में इस विमान को दिल्ली हवाई अड्डे पर सुरक्षित उतार लिया गया था, मगर अहम सवाल यह है कि देश भर में होने वाले विमान हादसों से सबक क्यों नहीं लिया जाता है? इस तरह की दुर्घटनाओं पर अंकुश लगाने और विमान यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी आखिर किसकी है?
इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि पायलटों तथा अन्य प्रशिक्षित कर्मियों की जरूरत के मुताबिक तैनाती नहीं हो पाने से संचालन तंत्र पर दबाव बढ़ रहा है और इससे मानवीय चूक की संभावनाएं भी अक्सर बनी रहती हैं। मगर जब पायलट नशीले पदार्थ का सेवन कर विमान उड़ाने लगे, तो यह व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न खड़ा करता है। क्या उड़ान से पहले चालक दल का जरूरी परीक्षण नहीं किया जाता है?
अगर नियमानुसार यह व्यवस्था लागू है, तो फिर क्या वजह है कि फुकेत-दिल्ली उड़ान के मुख्य पायलट के नशीले पदार्थ के सेवन की बात पहले पकड़ में नहीं आई, जिस कारण यात्रियों की जान मुश्किल में पड़ गई। अगर समय रहते स्थिति नियंत्रण में नहीं आती, तो बड़ा हादसा हो सकता था।
नागरिक उड्डयन मंत्रालय का कहना है कि इस हादसे के प्रारंभिक जांच निष्कर्षों को गंभीरता से लिया गया है और अब इसकी गहराई से जांच की जाएगी। मगर सवाल यही है कि क्या इस जांच के नतीजे से सबक लेकर भविष्य में ऐसी घटनाओं से निपटने के लिए अतिरिक्त सतर्कता एवं सुरक्षा उपायों पर ध्यान दिया जाएगा या फिर इसे भी संबंधित हादसे तक ही सीमित रखा जाएगा?
