हाल के वर्षों में भारत ने स्वास्थ्य क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है, लेकिन जब हम पिछड़े जिलों में स्वास्थ्य से जुड़ी जागरूकता पर नजर डालते हैं, तो एक अलग ही सच्चाई सामने आती है। अस्पतालों की कमी के साथ स्वास्थ्य संबंधी सामाजिक जागरूकता की कमी, संसाधनों की असमानता और नीतियों के जमीनी क्रियान्वयन की विफलता साफ दिखती है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-5) के आंकड़े बताते हैं कि भारत में स्वास्थ्य और पोषण से जुड़े मुद्दे केवल चिकित्सा सुविधाओं की कमी से नहीं, बल्कि जागरूकता के अभाव से भी गहराई से जुड़े हैं।
यह सर्वेक्षण देश के सात सौ से अधिक जिलों के आंकड़े उपलब्ध कराता है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि स्वास्थ्य को लेकर असमानता केवल राज्यों के बीच ही नहीं, बल्कि जिलों के भीतर भी मौजूद है। यदि हम बिहार जैसे राज्य को देखें, तो स्थिति बेहद चिंताजनक है। यहां लगभग 84 फीसद आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है, जहां स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंच सीमित है। लगभग 39 फीसद परिवारों के पास शौचालय की सुविधा नहीं है, जिससे खुले में शौच जैसी समस्याएं बनी रहती हैं, जो सीधे तौर पर संक्रमण से जुड़ी हैं।
यही नहीं, बच्चों में कुपोषण की स्थिति भी गंभीर है, लगभग 43 फीसद बच्चे बौने हैं। यह केवल भोजन की कमी नहीं, बल्कि पोषण संबंधी जागरूकता की कमी को भी दर्शाता है। बिहार के सीमांचल (कटिहार, किशनगंज, पूर्णिया) या झारखंड के गुमला और सिमडेगा जैसे जिलों में एक समान व्यवहार दिखता है, लोग बीमारी को तब तक गंभीर नहीं मानते, जब तक वह असहनीय न हो जाए। उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के सोनभद्र, चित्रकूट, बांदा, अलीराजपुर और मंडला जैसे जिलों में मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य की स्थिति भी आज चिंता का विषय है।
राष्ट्रीय सर्वेक्षण के अनुसार, कई महिलाओं को प्रसव पूर्व देखभाल नहीं मिल पाती। बिहार में लगभग अठारह फीसद महिलाओं ने गर्भावस्था के दौरान कोई चिकित्सा देखभाल नहीं ली। राजस्थान की तस्वीर और ज्यादा जटिल है। टीकाकरण में सुधार हुआ है, लेकिन जीवनशैली से जुड़ी बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं। तीस वर्ष से अधिक आयु के लगभग बीस फीसद लोग मधुमेह या उच्च रक्तचाप से ग्रस्त हैं, लेकिन उनमें से बहुत कम लोग नियमित उपचार कराते हैं।
झारखंड और मध्य प्रदेश के आदिवासी क्षेत्रों में पारंपरिक मान्यताओं तथा आधुनिक चिकित्सा के बीच दूरी अब भी बनी हुई है। कई बार लोग प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र तक नहीं पहुंचते और स्थानीय उपचारों पर निर्भर रहते हैं, जिससे तपेदिक, मलेरिया और खून की कमी जैसी बीमारियां लंबे समय तक छिपी रहती हैं। देश में यह संकट दोतरफा रूप में सामने आता है- एक ओर कुपोषण, दूसरी ओर नई जीवनशैली से होने वाली बीमारियां। यदि वैश्विक तुलना करें, तो जापान, फिनलैंड और आस्ट्रेलिया जैसे देशों में लोग नियमित जांच, संतुलित आहार और निवारक स्वास्थ्य पर अधिक ध्यान देते हैं। इसके विपरीत भारत में स्वास्थ्य को अक्सर अंतिम प्राथमिकता दी जाती है।
आज के परिदृश्य में इस संदर्भ में एक नया आयाम जुड़ रहा है, वह है आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआइ) यानी कृत्रिम बुद्धिमत्ता। सवाल यह है कि क्या एआइ स्वास्थ्य जागरूकता को बढ़ाने में मदद कर सकता है, खासकर उन ग्रामीण क्षेत्रों में जहां जानकारी की सबसे ज्यादा कमी है? ग्रामीण भारत में एआइ का सबसे बड़ा उपयोग जानकारी पहुंचाने में हो सकता है। आज भी कई गांवों में लोग बीमारी के लक्षणों को सही समय पर नहीं पहचान पाते। यदि मोबाइल आधारित एआइ उपकरण स्थानीय भाषा में सरल तरीके से यह समझाएं कि कब डाक्टर के पास जाना जरूरी है, कौन से लक्षण खतरनाक हैं और कौन-सी सावधानियां अपनानी चाहिए, तो यह एक बड़ा बदलाव ला सकता है।
एआइ का उपयोग आशा कार्यकर्ताओं और आंगनबाड़ी सेविकाओं के प्रशिक्षण में भी किया जा सकता है। यदि उन्हें मोबाइल पर ऐसे एआइ उपकरण मिलें, जो तुरंत जानकारी दें, लक्षणों का प्राथमिक विश्लेषण करें और सही सलाह सुझाएं, तो वे गांव-स्तर पर स्वास्थ्य जागरूकता की सबसे मजबूत कड़ी बन सकती हैं। यह तकनीक डाक्टर की जगह नहीं ले सकती, लेकिन चिकित्सक और ग्रामीण समाज के बीच की दूरी जरूर कम कर सकती है। फिर भी यह याद रखना जरूरी है कि एआइ केवल एक साधन है, समाधान नहीं।
देश में स्वास्थ्य जागरूकता की चुनौती केवल अस्पताल या दवाइयों की नहीं, बल्कि सोच और व्यवहार की भी है। बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान के पिछड़े जिलों की स्थिति हमें यह सिखाती है कि स्वास्थ्य सुधार के लिए जागरूक समाज सबसे जरूरी है। आज भी देश के करोड़ों घरों में दवाइयों की पहचान उनके नाम से नहीं, बल्कि रंग और आकार से होती है। यह सिर्फ एक आदत नहीं, बल्कि स्वास्थ्य जागरूकता की गहरी कमी का संकेत है। जब दवा का नाम, उसका उपयोग और उसका असर हमें पता ही नहीं, तो इलाज कैसे सही होगा? देश के ग्रामीण इलाकों में यह आम बात है कि लोग डाक्टर की सलाह के बजाय पुराने पर्चे या दूसरों के अनुभव के आधार पर दवा ले लेते हैं। कई बार एक ही दवा अलग-अलग बीमारी में खा ली जाती है, क्योंकि उसकी पहचान केवल रंग या आकार से जुड़ी होती है।
यह समस्या सिर्फ दवाइयों तक सीमित नहीं है। हम अपने शरीर के संकेतों को भी अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं- हल्का बुखार, लगातार थकान, खांसी या वजन में बदलाव को सामान्य मानकर टाल देते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में ही नहीं, शहरों में भी अक्सर यह देखा जाता है कि लोग तब तक डाक्टर के पास नहीं जाते, जब तक बीमारी गंभीर न हो जाए। यह सोच अब बदलने की जरूरत है। हमें यह समझना होगा कि स्वास्थ्य केवल अस्पताल या दवा का विषय नहीं, बल्कि रोजमर्रा की आदतों और जागरूकता से जुड़ा मामला है। अगर आज भी हम दवाइयों को रंग से पहचान रहे हैं, तो यह विचार करने का समय है कि हम विकास की इस दौड़ में स्वास्थ्य समझ के स्तर पर वास्तव में कितना आगे बढ़े हैं।
ग्रामीण भारत में स्वास्थ्य जागरूकता का सबसे बड़ा संकट ‘जानकारी का अभाव’ है। कई बार लोग यह तक नहीं समझ पाते कि कौन-सा लक्षण सामान्य है और कौन-सा खतरनाक। आज भी कई गांवों में डाक्टर तक पहुंच सीमित है, लेकिन वहां मोबाइल पहुंच चुका है। ऐसे में एआइ उस खाली जगह को भर सकता है। इसके जरिए कम से कम स्वास्थ्य से जुड़ी जानकारी तो लोगों तक पहुंच सकती है। अगर आशा कार्यकर्ता और आंगनबाड़ी सेविकाओं के हाथ में एआइ आधारित सरल तकनीक आ जाए, तो वे सिर्फ सूचना देने वाली नहीं, बल्कि ‘स्मार्ट हेल्थ गाइड’ बन सकती हैं। वे घर-घर जाकर केवल सलाह नहीं देंगी, बल्कि सही और तुरंत जानकारी के आधार पर लोगों को समझा पाएंगी। इससे भरोसा भी बढ़ेगा और लोगों का स्वास्थ्य के प्रति व्यवहार भी बदलेगा। मगर एक बात साफ है कि तकनीक तभी काम करेगी, जब वह लोगों की भाषा और उनकी जरूरत के हिसाब से ढले। वरना एआइ भी एक कागजी योजना बनकर रह जाएगी। इसलिए जरूरी है कि देश में स्वास्थ्य जागरूकता को लेकर सरकारी और सामाजिक स्तर पर एकजुट होकर प्रयास किए जाएं।
